The 'mask tradition' came from Multan, Pakistan in Dussehra festival
40 दिन ब्रह्मचर्य का पालन कर हनुमान जी के वेश में निकले 14 कलाकारों ने एक बार फिर दशहरा पर्व पर साबित कर दिया कि आजादी के पहले पाकिस्तान के मुल्तान से चली आ रही मुखौटा परंपरा आज भी जिंदा है। हनुमान जी का मुखौटा और सिंदूर में लिपटे कलाकार को भक्त पूजनीय मान कर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। हर भक्त की यही चाह होती है कि राम भक्त के शरीर पर लगा सिंदूर जितना उन्हें लगे उतना ही अच्छा है।
शुक्रवार दशहरे पर्व पर प्रताप चौक से गोकर्ण धाम तक निकली शोभायात्रा में हनुमान जी के रूप में 14 कलाकार आकर्षण का केंद्र रहे। इसमें चार व छह साल के बच्चे से लेकर बडे़ कलाकार भी शामिल थे। इन कलाकारों ने हनुमान जी का मुखौटा पहनने से पहले 40 दिन ब्रह्मचर्य का पालन किया और सुबह-शाम मुखौटे को हनुमान जी का रूप समझ कर उनका पूजन किया। ओम प्रकाश गुलाटी ने बताया कि मुखौटा परंपरा उनके पूर्वज पाकिस्तान के मुल्तान से लाए थे। पहले यह बेरी में होता था, इसे फिर रोहतक लाया गया। 40 दिन कलाकार जमीन पर सोता है और मीठा ही खाता है। इसमें अर्णव व सुरेश पुत्र-पिता ने हनुमान का रूप रखा है। वहीं अशोक गुलाटी, सुरेंद्र नरूला व मदन गुलाटी ने बताया कि मुखौटा लकड़ी व अन्य सामग्री का बना होता है। इसे पहन कर तीन से चार किलोमीटर नाचते हुए चलना आसान नहीं होता। लेकिन हनुमान जी के आशीर्वाद से भक्त यह कर पाते हैं। मान्यता है कि हनुमान जी का सिंदूर जितना भक्त को लगता है उतना ही उसे आशीर्वाद मिलता है।