डॉ. नरेश मिश्र
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डॉ. नरेश मिश्र को हरियाणा के अलग-अलग शहरों में हिंदी के शिक्षण कार्य से जुड़े 48 साल से ज्यादा समय हो गया है। मानक हिंदी कैसी हो और व्याकरण दोष से मातृभाषा कैसे मुक्त हो, यह उनके जीवन का मिशन बन चुका है। बुधवार देर रात जब उन्हें हरियाणा साहित्य अकादमी का महाकवि सूरदास सम्मान मिलने की सूचना मिली, तो इसे वह तपस्या के प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की बात कहते हैं।
करीब 74 साल की उम्र में भी वह हिंदी की सेवा और लेखन में अनवरत सक्रिय हैं। देर रात अमर उजाला से बातचीत में वह कहते हैं कि महाकवि के प्रदेश में करीब आधी सदी हिंदी की सेवा करने के बाद उन्हीं के नाम का पुरस्कार मिलने से बड़ा सम्मान एक भाषाप्रेमी के लिए क्या हो सकता है। वह सदैव कहते हैं कि देश की युवा पीढ़ी सही हिंदी बोले और लिखे, इसके लिए ही तो वह निरंतर शोध के बाद सरल भाषा में पुस्तकें लिखते रहते हैं। उनके जीवन के उद्देश्य को उनकी पुस्तकों के नाम से समझा जा सकता है- हिंदी मानकीकरण और प्रयोग, भाषा शब्द समूह का विकास। उन्होंने हिंदी भाषा और हरियाणवी बोली पर भी बहुत काम किया है।
यूपी में जन्म, दिल्ली में पढ़ाई और हरियाणा को बनाया कर्मभूमि
डॉ. नरेश का जन्म 1 जनवरी 1951 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के महमूदपुर गांव में हुआ था। दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई के करने के बाद उन्हे साहित्य महोपाध्याय तक की उपाधि मिली। हरियाणा में वह 1976 में पानीपत के एक कॉलेज में अ्ध्यापन करने आए और फिर यहीं के होकर रह गए। एमडीयू में हिंदी विभाग के अध्यक्ष और मानविकी संकाय के डीन रहे। बाद में हरियाणा केंद्रीय विश्विद्यालय, महेंद्रगढ़ में डॉ मिश्र को हिंदी विभागाध्यक्ष के साथ प्रभारी कुलपति का दायित्व भी मिला।
प्रमुख रचनाएं
प्रो. (डॉ.) नरेश मिश्र ने हिंदी और संस्कृत में व्याकरण से लेकर भाषा के मानक लेखन पर कई किताबें लिखीं जो कई विश्विद्यालय में पढ़ाई जाती हैं। इसके अलावा लघु कथा संग्रह – जब पीपल रो पड़ा और प्रकाश पर्व, कहानी संग्रह- घर से बाहर तक, मीडिया लेखन, मानक हिंदी और हरियाणवी के साथ ही यात्रा वृतांत और उपन्यास भी लिखे। उनकी वर्तमान में 50 से ज्यादा रचनाएं उपलब्ध हैं। उनका लेखन प्रयोग की तरह होता है, जो उस विधा को स्थापित करता है।