पीजीआईएमएस के आपात विभाग में खरीदी जाने वाली दवाओं में बडे़ घोटाले का परदाफाश हो सकता है। मामले में डॉक्टरों की एक टीम ने जांच करके अपनी रिपोर्ट आगे भेज दी है। अब अकाउंट विभाग और विजिलेंस मिलकर इसकी जांच कर सकते हैं। आशंका जताई जा रही है कि मामले में कई लोग लपेटे में आ सकते हैं।
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस) में दवाओं के रेट कांट्रेक्ट में गड़बड़ी की शिकायत जैसे ही प्रदेश सरकार तक पहुंची, तत्काल जांच के आदेश हो गए। एक माह पहले विवि प्रशासन ने जांच डॉ. प्रदीप गर्ग, डॉ. सुधीर कुमार और डॉ. आरबी जैन को सौंपी थी।
इनकी जांच में सामने आया है कि एक ही दवा जो बाजार में अलग-अलग कीमतों में उपलब्ध है वह विभाग में महंगी कीमत में खरीदी गई है। हैरानी की बात है कि जिस जगह से दवा खरीदी गई है उसने बिल में दवा कंपनी का नाम नहीं लिखा है। जबकि विक्रेता को दवा का बिल, दवा का बैच नंबर पूरे नाम के साथ लिखना अनिवार्य होता है। जांच टीम का कहना है कि एक दवा की कीमत कंपनियां उसकी गुणवत्ता के आधार पर तय करती हैं, लेकिन आपात विभाग में दवा कौन सी आई है, इसकी पुष्टि कैसे हो।
सीएमओ और एमएस करते हैं खरीदारी
आपातकालीन विभाग में 2000 रुपये प्रति दिन के हिसाब से दवा खरीदने का अधिकार सीएमओ और 50 हजार रुपये तक का अधिकार एमएस को होता है। पहले दवा सेंट्रल स्टोर से उपलब्ध होती थी, लेकिन अब सीधे खरीदी जाने लगी है। इस मामले में एमएस, सीएमओ, अकाउंट ब्रांच सभी पर सवाल उठ गया है। गौरतलब है कि आपात विभाग में प्रतिदिन 1000 से 1200 के करीब मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं।
सवालों के घेरे में निदेशक कार्यालय भी
दवाओं के रेट कांट्रेक्ट करने में निदेशक कार्यालय भी सवालों के घेरे में है। रेट कांट्रेक्ट किसने किया और कब से गड़बड़ी चल रही है, इसका खुलासा जांच के बाद होगा। इसमें सबसे अधिक ध्यान जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के दिनों में खरीदी गई दवाओं पर दिया जा रहा है। इस दौरान ही आपात स्थिति में दवाओं की सबसे अधिक खरीद हुई थी। सूत्रों की मानें तो विभाग की दवाओं की खरीद में 40 से 50 फीसदी तक घोटाला मिल सकता है। यही कारण है कि आपातकालीन विभाग अकसर दवाओं की कमी से जूझता रहता है।