सरकार से लेकर सामाजिक संगठन तक नशाखोरी रोकने के लिए तमाम अभियान चलाते रहते हैं, लेकिन लोगों पर इसका खास असर दिखाई नहीं दे रहा है। पीजीआई के नशा मुक्ति केंद्र के आंकड़े बताते हैं कि दस साल में नशा करने वालों की संख्या में करीब पांच गुना इजाफा हो गया है। यही नहीं साल 2014-15 में नशा करने वालों की संख्या में अधिक वृद्धि हुई है। लोगों में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति से नशा मुक्ति केंद्र चलाने वाले भी हैरान हैं।
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस) के नशा मुक्ति केंद्र में हर दिन 15 से 20 मरीज आते हैं। इनमें सबसे अधिक शराब का सेवन करने वाले होते हैं।
इसके बाद हेरोइन और कोकीन का सेवन करने वाले होते हैं। हालांकि तंबाकू का सेवन करने वाले भी काफी संख्या में आते हैं। गौर करने की बात यह भी है कि नशे की गिरफ्त में आने वाले 40 साल से कम उम्र वाले अधिक हैं। इससे लगता है कि युवाओं में नशे की प्रवृत्ति अधिक है।
साल 2005 से अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो काफी दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। वर्ष 2005 में नशा मुक्ति केंद्र में आने वाले नशे के आदी लोगों की संख्या 710 थी, लेकिन दस साल बाद वर्ष 2015 में 3400 मरीज नशा मुक्ति केंद्र में इलाज के लिए पहुंचे। चालू साल 2016 में अब तक लगभग 900 मरीज नशा मुक्ति केंद्र आ चुके हैं।
केवल नशा मुक्ति केंद्र में पहुंचने वाले नशे के आदी लोगों की संख्या बताती है कि स्थिति काफी भयावह होती जा रही है। जानकार बताते हैं कि नशा मुक्ति केंद्र नहीं पहुंचने वाले भी बड़ी तादाद में हैं। ऐसे लोग शर्म और झिझक के कारण नशा मुक्ति केंद्र में नहीं आते हैं।
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नशा करने वालों में रोहतक अव्वल
पीजीआई के नशा मुक्ति केंद्र में आने वाले मरीजों में अधिकतर रोहतक जिले के होते हैं। जानकार बताते हैं कि इसकी वजह पीजीआई का रोहतक जिले में स्थित होना है। नजदीक होने की वजह से लोग नशा मुक्ति केंद्र का लाभ उठाते हैं। यही वजह है कि कुल मरीजों में रोहतक जिले के मरीजों का प्रतिशत करीब 40 प्रतिशत होता है।
प्रदेश के दूसरे जिलों से भी काफी संख्या में मरीज नशा मुक्ति केंद्र आते हैं। इसमें झज्जर जिला दूसरे स्थान पर है। कुल मरीजों में झज्जर का प्रतिशत 15-20 होता है, जबकि सोनीपत से 10-15 प्रतिशत, भिवानी और जींद से करीब 10-10 प्रतिशत नशा करने वाले मरीज नशा मुक्ति केंद्र पहुंचते हैं। सिरसा, फतेहाबाद और हिसार से भी काफी संख्या में मरीज पहुंचते हैं।
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कुछ ऐसे हैं नशे के आंकडे़
साल ओपीडी फालोवर (पुराने मरीज)
2005 266 444
2006 243 377
2007 188 260
2008 330 225
2009 335 238
2010 312 463
2011 428 414
2012 704 799
2013 895 1601
2014 1038 1609
2015 1440 1950
2016 500 400
नोट : यह आंकड़े पीजीआई के नशा मुक्ति केंद्र के हैं। साल 2016 के आंकड़े अप्रैल माह प्रथम सप्ताह तक के हैं।
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इन पदार्थों का होता है अधिक इस्तेमाल
पदार्थ ओपीडी फालोवर
नशीले पदार्थ 826 445
अल्कोहल 742 1043
भांग आदि पदार्थ 80 129
तंबाकू 103 29
नोट : यह आंकड़े साल 2015 के हैं। इनके अलावा अन्य प्रकार का भी नशा लोग करते हैं।
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बोले चिकित्सक
- नशा मुक्ति केंद्र के डॉ. विनय कुमार का कहना है कि कई बार व्यक्ति शौकिया तौर पर नशे की शुरूआत करता है, लेकिन धीरे-धीरे वह इसका आदी हो जाता है। कुमार का कहना है कि नशा करने का सबसे बड़ा कारण प्यार और पारिवारिक समझ की कमी होती है। लेकिन लोग मानसिक परेशानी और गलत संगत में पड़कर भी नशा करने लगते हैं।
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- डॉ. सुनील राठी का कहना है कि शराब, बीयर और नींद आदि की गोलियां भी व्यक्ति को नशे का मरीज बना देती हैं। इनके सेवन से दिमाग के तंत्रिका तंत्र की गति धीमी हो जाती है, जिस कारण व्यक्ति खुद को चिंता और मानसिक परेशानी से मुक्ति महसूस करने लगता है, जबकि यह क्षणिक होता है। बाद में इसका शरीर पर बुरा असर पड़ता है। नशा छोड़ने के लिए इलाज के साथ-साथ इच्छाशक्ति की भी आवश्यकता होती है।