एनसीआर में वायु प्रदूषण घटाने और पंचायतों की आमदनी बढ़ाने के लिए बागवानी विभाग ने जिले भर में इस मानसून सीजन के दौरान सौ एकड़ रकबे में बाग विकसित करने की तैयारी की थी। लेकिन अब तक सिर्फ 22 एकड़ जमीन ही मिली है, उसमें भी ज्यादातर में कीकर लगे हुए हैं। एनसीआर रीजन में हर साल सर्दियों में स्मॉग एक बड़ा मुद्दा बनता है। इसे देखते हुए बागवानी विभाग ने जिले भर में सौ एकड़ में फलों के बाग विकसित करने का लक्ष्य रखा था। इसमें नींबू और अमरूद के पौधे लगाए जाने थे, जो तीन साल में विकसित हो जाते हैं। इसके लिए विकास व पंचायत विभाग को विभिन्न गांवों में पंचायतों और किसानों से जमीन दिलवाने के लिए कहा गया। कोई किसान अगर इसे अपनाता है तो बागवानी विभाग उसे पहले साल 4600 रुपये प्रति एकड़ और अगले दो साल तक 1800 रुपये प्रति एकड़ इंसेंटिव दिया जाना था। पंचायतों का सारा काम मनरेगा के तहत होना था। बागवानी विभाग ने तकनीकी सहायता करनी थी। मकसद यह था कि तीन साल बाद बाग विकसित हो जाएंगे तो पंचायतों लाखों रुपये की सालाना आमदनी शुरू हो जाएगी। लेकिन जिले भर में सिर्फ दो ब्लॉकों के चार गांवों की पंचायतों ने ही इसके लिए हामी भरी। जिनका कुल रकबा करीब 22 एकड़ है। विकास व पंचायत विभाग ने सभी बीडीपीओ से कहा है कि और जमीन की निशानदेही की जाए, ताकि मानसून में पौधरोपण शुरू हो सके। बीडीपीओ की दलील के पंचायतें इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं क्योंकि तीन साल तक देखरेख अहम मुद्दा है। उधर, बागवानी विभाग का कहना है कि जो जमीन उन्हें बताई गई है, वहां कीकर लगे हैं। उनकी सफाई के बिना बाग नहीं विकसित किये जा सकते।
सौ एकड़ में बाग विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें से 22 एकड़ के प्रस्ताव आ चुके हैं। सभी बीडीपीओ को निर्देश दिए गए हैं कि अन्य गांवों में जमीन की निशानदेही करें।
- नरेंद्र धनखड़, जिला विकास व पंचायत अधिकारी।
सौ एकड़ में बाग विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन विकास व पंचायत विभाग से अभी तक सिर्फ 22 एकड़ जमीन का प्रस्ताव आया है। उसमें भी महम के आसपास की जमीन में कीकर लगे हैं।
- डॉ. हवा सिंह, जिला बागवानी अधिकारी।