एमबीबीएस में प्रवेश के लिए सरकारी कॉलेजों में 10 लाख रुपये हर वर्ष देने की बॉन्ड पॉलिसी के खिलाफ शनिवार को भी विद्यार्थियों को धरना-प्रदर्शन जारी रहा। रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन (आरडीए) ने भी प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों के समर्थन में सुबह दस से ग्यारह बजे तक काम बंद रखकर रोष जताया।
हालांकि आरडीए की ओर से पहले सुबह नौ से 12 बजे तक पेन डाउन रखने का फैसला लिया गया था। आरडीए के काम नहीं करने से ओपीडी में मरीजों को इलाज के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। यही नहीं, दोपहर बाद तक उनकी कतार नजर आई।
इधर, देर शाम स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनीता सक्सेना के साथ विद्यार्थियों के दल की लंबी बातचीत हुई। लेकिन यह बेनतीजा रही। इसमें प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों के विद्यार्थी शामिल रहे। यहां विद्यार्थियों को उनके मांग पर सहमति से इनकार करते हुए सरकार के मानकों से मेल खाता नया मांग पत्र देने को कहा गया है।
शनिवार को दिन भर विवि या कॉलेज प्रशासन से बातचीत का इंतजार कर रहे विद्यार्थियों को देर शाम कुलपति ने अपने कार्यालय में बुलाया। यहां आरडीए के अलावा प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों के चयनित विद्यार्थी बातचीत के लिए पहुंचे। प्रशासन की ओर से पीजीआई निदेशक डॉ. एसएस लोहचब, डीन एकेडमिक अफेयर्स डॉ. अशोक चौहान, कुलसचिव डॉ. एचके अग्रवाल व अन्य चिकित्सक भी मौजूद रहे।
इनके बीच करीब दो घंटे की लंबी बातचीत हुई। इस दौरान पूरे मांग पत्र पर चर्चा हुई। अंत में सरकार की ओर से उनके मांग पत्र पर सहमति नहीं बनी। बातचीत में शामिल विद्यार्थियों ने बताया कि हमें पुन: सोच विचार कर नया मांग पत्र देने के लिए कहा गया है। यह मांग पत्र सरकार की मौजूदा व्यवस्था के आसपास या उससे मेल खाता हो।
इसके बाद विद्यार्थियों ने आपस में चर्चा कर जल्दी ही अपना नया मांग पत्र सरकार को भेजने के साथ सरकार, डीएमईआर या सचिव स्वास्थ्य विभाग से सीधे बातचीत की आवश्यकता जताई। विवि या कॉलेज प्रशासन का आभार जताते हुए विद्यार्थियों ने कहा कि वे हमारी बात सरकार तक पहुंचा तो रहे हैं, मगर यह प्रक्रिया लंबी है। इसलिए सीधे बातचीत की जाए।
विद्यार्थियों का कहना है कि सरकार ने हमारी सेवा अवधि एक वर्ष रखने, दो माह में नौकरी सुनिश्चित करने व बॉन्ड राशि के पांच लाख रुपये निर्धारित करने से इनकार कर दिया है। विद्यार्थियों को बॉन्ड राशि व सेवा अवधि बढ़ाने को कहा गया है। जबकि विद्यार्थी इसके विरोध में हैं। हमारा विरोध जारी रहेगा। सरकार ने बात नहीं मानी तो पंचकूला कूच के साथ स्वास्थ्य सेवाएं रोकने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
इससे पूर्व शनिवार सुबह बॉन्ड पॉलिसी के खिलाफ में एमबीबीएस विद्यार्थियों के साथ आरडीए भी समर्थन में आई। इसके चलते ओपीडी में एक घंटे काम बंद रखा। यहां प्रदर्शनकारी विद्यार्थी भी अपने पोस्टर-बैनर लेकर पहुंचे। ओपीडी हॉल, विभागों व चिकित्सकों के कमरों के बाहर पोस्टरों के साथ खड़े होकर बॉन्ड पॉलिसी का विरोध किया व लोगों को संघर्ष में सहयोग की अपील की।
लोगों को पॉलिसी के नुकसान व प्रतिभाओं के वंचित होने समेत स्वास्थ्य सेवाएं की गुणवत्ता में कमी आने के संभावित खतरे से सचेत करते हुए इसके खिलाफ आवाज उठाने की अपील की। विद्यार्थियों की पीजीआई निदेशक से समय मिलने के बावजूद मुलाकात नहीं हो पाई। दोपहर बाद विद्यार्थियों ने प्रशासन से संपर्क किया तो शाम को कुलपति से मिलवाने का आश्वासन मिला।
इधर, अल सुबह इलाज के लिए घर से पीजीआई पहुंचे मरीजों को काफी परेशानी उठानी पड़ी। ओपीडी में सुबह दस से ग्यारह बजे तक काम बंद रहा। इस कारण मरीजों को यह सांकेतिक हड़ताल समाप्त होने तक इंतजार करना पड़ा। यही नहीं, मरीजों को राहत पहुंचाने के वरिष्ठ चिकित्सक उनकी जांच व अन्य कागजी कार्रवाई करते दिखाई दिए।
मरीज बोले-हड़ताल खत्म होने का कर रहे इंतजार
सीने में तकलीफ है। इसलिए जांच के लिए पीजीआई आया हूं। यहां आते ही एक घंटे की हड़ताल का पता लगा। इसलिए बाहर धूप में लेटा हूं। ओपीडी शुरू होने पर डॉक्टर को दिखाऊंगा।
- शमसुद्दीन, सोहना।
किडनी में दिक्कत है। निजी अस्पताल में आराम नहीं मिला। इसलिए पीजीआई आया। यहां भी हड़ताल बता रहे हैं। इसलिए बाहर बैठकर इंतजार कर रहा हूं। हड़ताल खत्म होगी तो डॉक्टर से मिलूंगा।
- राजू, गोहाना।
बुखार ने कई दिनों से परेशान कर रखा है। आराम नहीं मिला तो पीजीआई की ओपीडी आई। यहां भी लंबी लाइन लगी है। काफी देर से लाइन आगे ही नहीं बढ़ रही है। पता लगा डॉक्टर जांच नहीं कर रहे हैं।
- सती, प्रेमनगर।
शुगर बढ़ी हुई है। इस कारण तबीयत बिगड़ी हुई है। पीजीआई आई तो यहां डॉक्टर हड़ताल पर मिले। उनके कमरों के बाहर भीड़ जमा है। थोड़ी देर में काम शुरू होगा तो शायद मेरा भी नंबर आ जाएगा।
- शकुंतला, खेरडी।
कुछ दिनों से तबीयत खराब है। राहत नहीं मिली तो ओपीडी में दिखाने आ गया। यहां एक घंटे की हड़ताल का पता लगा। इस कारण काफी देर से इंतजार कर रहा हूं। हड़ताल के कारण लाइन काफी बड़ी हो गई है।
- रणवीर, भिवानी।
सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेज नहीं समान
पीजीआई के एमबीबीएस के छात्र पंकज बिट्ठू ने कहा कि सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेज एक समान नहीं हैं। निजी मेडिकल कॉलेजों में कम अंक पाने वाले रुपये देकर प्रवेश प्राप्त करते हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में विद्यार्थी मेहनत कर नीट में टॉप करके प्रवेश पाते हैं। सस्ती व गुणवत्तापरक शिक्षा पाने के लिए ही विद्यार्थी दो से तीन साल घर पर रह कर नीट की तैयारी करते हैं और 720 में से 650 नंबर या रैंक लेकर प्रवेश प्राप्त करते हैं। इस पर भी 40 लाख रुपये दें। यह कहां का न्याय है। नौकरी सरकार के पास है नहीं। ऐसे में कर्जदार विद्यार्थी बॉन्ड के 40 लाख रुपये व इसका ब्याज कैसे चुकाएंगे। सरकार की इस व्यवस्था से केवल धनाढ्य लोग ही अपने बच्चों को डॉक्टर बना सकेंगे। फिर उनके पास काबिलियत हो या न हो। इससे स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह प्रभावित होंगी। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता दोयम दर्जे की हो जाएगी। इसलिए नेताओं को बयान देते समय पूरा अध्ययन कर लेना चाहिए। नेता व्यवस्था की बात करते हैं तो एम्स देश का सबसे बेहतर कॉलेज व संस्थान है। यहां फीस पांच हजार रुपये है। सरकार के हिसाब से तो यहां की सुविधाओं के हिसाब से दस लाख रुपये फीस होनी चाहिए। सरकार स्वास्थ्य बजट बढ़ाए। प्रतिमाओं व अन्य चीजों पर सरकारी धन बर्बाद करना बंद करे। सरकार डिग्री पूरी होते ही हमें दो माह में नौकरी सुनिश्चित करे। सेवा अवधि एक साल व बॉन्ड पांच लाख रुपये से अधिक न हो। इस पर सरकार को सहमत होना होगा। ऐसा नहीं होने पर आंदोलन तेज होगा।