हमें हमेशा एंटीबायोटिक्स लिखने से पहले मरीज की अच्छी तरह से जांच कर लेनी चाहिए। क्योंकि वायरल इंफेक्शन में एंटीबायोटिक्स नहीं देनी चाहिए। बच्चे मासूम होते हैं। उन्हें कभी भी बिना वजह एंटीबायोटिक्स नहीं दी जानी चाहिए। हमेशा एक अच्छे चिकित्सक की सलाह पर ही बच्चे को दवाई देनी चाहिए। यह कहना है पीजीआईएमएस की निदेशक डॉ. गीता गठवाला का। वे शनिवार को लेक्चर थियेटर पांच में आयोजित एंटीमाईक्रोबिअल जागरूकता सप्ताह 2021 में बतौर मुख्य अतिथि बोल रही थी।
निदेशक ने कहा कि जब चिकित्सक को जांच में पता चले कि इंफेक्शन है, तभी एंटीबॉयोटिक्स देनी चाहिए। यदि किसी को फंगल इंफेक्शन है तो उसे सिर्फ फंगल इंफेक्शन की दवाई दें। बिना वजह एंटीबॉयोटिक्स शामिल न करें। उन्होंने कहा कि जहां पर आप कार्य करते हैं, वहां की एंटीबॉयोटिक्स पॉलिसी होनी चाहिए। चिकित्सा अधीक्षक डॉ. ईश्वर सिंह ने कहा कि यदि हम वायरल में मरीज को एंटीबायोटिक्स दे देते हैं और कुछ दिन में मरीज को इंफेक्शन हो जाता है तो फिर एंटीबॉयोटिक्स देनी पड़ती है। माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अपर्णा परमार ने बताया कि 18 से 24 नवंबर तक विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह मनाया जा रहा है। इसके तहत नेशनल सेंटर फॉर डिजिज कंट्रोल, एमओएचएफडब्लू, भारत सरकार के सहयोग से यह व्याख्यान आयोजित किया गया है। इसमें नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल, नई दिल्ली के अधिकारी भी शामिल हुए। यहां विद्यार्थियों को एंटीबायोटिक्स को लेकर किए जा रहे सर्वे फार्म भरने की ट्रेनिंग भी कराई गई। डॉ. नीति मित्तल ने बताया कि एंटीबायोटिक्स का चलन द्वितीय विश्व युद्ध में पेनसिलिन से शुरू हुआ था। इस मौके पर डॉ. राकेश मित्तल, डॉ. निधि गोयल, डॉ. कौशल्या उपस्थित रहीं।