न उम्र की सीमा हो ...
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उम्र को हराकर जीवन के लक्ष्य पर निशाना लगा रहे पैरा धनुर्धर
-रोहतक में हुई नेशनल पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में 77 में से 13 तीरंदाज 35 वर्ष से ज्यादा आयु के पहुंचे
हरीश पौड़िया
रोहतक। गजल गायक जगजीत सिंह की एक मशहूर गजल की एक पंक्ति है, ‘न उम्र की सीमा हो...’ ये लाइनें उन सभी तीरंदाजों पर एकदम सटीक बैठती हैं। जिन्होंने उम्र की सीमा को पछाड़कर उस समय खेलना शुरू किया जिस समय आमतौर पर साधारण व्यक्ति घर पर यह सोचकर बैठ जाता है कि अब कुछ नया नहीं हो सकता, परंतु इस सोच को देशभर के 13 दिव्यांग तीरंदाजों ने बदला है। इन्होंने जीवन के 35 वर्ष व उससे भी ज्यादा वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी इस क्षेत्र में मुकाम हासिल करने का लक्ष्य बनाया है। अपने-अपने प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन के बाद ये सभी रोहतक में हो रही तीसरी नेशनल पैरा आर्चरी चैंपियनशिप में भाग लेने आए। इन्होंने न सिर्फ भाग लिया बल्कि युवा तीरंदाजों को पछाड़ते हुए पदक भी हासिल किए। प्रतियोगिता में इन 13 तीरंदाजों में से 10 ने चैंपियनशिप में पदक हासिल किए हैं।
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नाम : मनोज कुमार चौहान
उम्र : 54 वर्ष
तीरंदाजी का अनुभव : 10 वर्ष
उपलब्धियां : 17 स्टेट मेडल व नौ नेशनल मेडल
स्ट्रेस खत्म करने के लिए चुनीं तीरंदाजी और बने चैपिंयन
महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले मनोज ने 44 वर्ष की आयु में तीरंदाजी को चुना। दस वर्ष में काफी नाम भी कमा लिया। वे स्थानीय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। काम के दौरान उन्हें बहुत स्ट्रेस का सामना करना पड़ता था। इसी स्ट्रेस को कम करने के लिए मनोज ने तीरंदाजी शुरू की।
विलास दवणे
नाम : विलास दवणे
उम्र : 52 वर्ष
तीरंदाजी का अनुभव : 10 वर्ष
उपलब्धियां : वर्ल्ड चैंपियनशिप, एशियन गेम्स, फैजा वर्ल्ड रैंकिंग में देश का प्रतिनिधित्व, एशिया कप में तीन ब्रांज मेडल
2009 में की शुरुआत, कई मेडल किए नाम
महाराष्ट्र के अहमदनगर में रहने वाले और आर्मी में सिविल क्लर्क के पद पर कार्यरत विलास दवणे ने वर्ष 2009 में पैरा आर्चरी फेडरेशन की शुरुआत की। इससे पहले वे पैरा पावर लिफ्टिंग व पैरा एथलेटिक्स में अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने महसूस किया कि देश में बहुत से ऐसे दिव्यांग हैं जो इन खेलों में नहीं खेल सकते लेकिन अन्य खेलों में भाग ले सकते हैं। उन्होंने उन टूर्नामेंटों में अन्य देशों के पैरा खिलाड़ियों को तीरंदाजी में खेलते देखा। वहीं से उनके मन में देश में भी पैरा तीरंदाजी शुरू करने की बात मन में आई, और वर्ष 2009 में उन्होंने देश में पैरा आर्चरी की शुरुआत कर दी।
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नाम : अंजलि शिंदे
उम्र : 45 वर्ष
डेब्यू टूर्नामेंट में ही गोल्ड मेडल
महाराष्ट्र के पुणे में रहने वाली अंजलि शिंदे ने इसी वर्ष ही तीरंदाजी शुरू की है। यह उनका पहला ही टूर्नामेंट था जिसमें उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल कर लिया है। इससे पहले पांच वर्ष से 12 वर्ष की आयु तक उन्होंने जिम्नास्टिक व रोप मलखम में स्कूल नेशनल में गोल्ड मेडल हासिल किया। इसी दौरान उन्हें खेल के दौरान ही चोट लग गई। इस चोट से उबरने के बाद उन्होंने 45 वर्ष की आयु में खेलना शुरू किया।
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नाम : आदिल अंसारी
उम्र : 38 वर्ष
स्वीमिंग से तीरंदाजी की तरफ बढ़ा रुझान
महाराष्ट्र के थाणे जिले के भिवंडी के पैरा तीरंदाज आदिल अंसारी ने 22 वर्ष की आयु में जब पानी में डूबकी लगाई तो पानी के अंदर पत्थर से गर्दन टकराने के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी गर्दन से टूट गई। इसकी रिकवरी में उन्हें पांच वर्ष लगे। उसके बाद डेढ़ वर्ष तक स्वीमिंग की। जिस दौरान स्वीमिंग में दो बार नेशनल चैंपियन बने। लेकिन पुल में व्हील चेयर की एसेसिबिलिटी न होने के कारण उन्होंने स्वीमिंग छोड़ तीरंदाजी शुरू कर दी।