रेवाड़ी। किसी ने अभी दुनिया में आंखें खोली थीं तो किसी को जन्म के कुछ दिन भी नसीब नहीं हुए। किसी मासूम की किलकारी अस्पताल तक पहुंची तो किसी का अस्तित्व कचरे के ढेर और नहर के किनारे खत्म हो गया। जिले में नवजात शिशुओं को लावारिस छोड़ने की घटनाएं समाज को झकझोर रही हैं।
ताजा मामला जाटूसाना क्षेत्र के खुशपुरा गांव के पास छोटी नहर का है। नहर में शुक्रवार को नवजात बच्ची का शव मिलने की जानकारी होने से लोग हतप्रभ हो उठे। नहर के कैनाल गार्ड ने डायल 112 पर सूचना दी कि पानी में नवजात का शव पड़ा है।
इसकी सूचना मिलते ही जाटूसाना थाना पुलिस मौके पर पहुंची और सीन ऑफ क्राइम टीम को बुलाया। आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए रेवाड़ी के सरकारी अस्पताल भेज दिया गया।
जाटूसाना थाना प्रभारी प्रिंस के अनुसार शुरुआती जांच में सामने आया कि बच्ची की नाल भी नहीं काटी गई थी। इससे आशंका जताई गई कि उसका जन्म करीब दो दिन पहले हुआ होगा। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि बच्ची का शव नहर में कहां से आया।
करीब 15 किलोमीटर लंबी नहर होने के कारण जांच का दायरा भी बढ़ गया है। जिले में ऐसी घटनाएं पहली बार सामने नहीं आई हैं। हर साल ऐसे मामले आते रहते हैं।
मई 2026 में रेवाड़ी-तिजारा बॉर्डर के पास एक सूखे कुएं में लावारिस छोड़ी गई नवजात बच्ची को सुरक्षित बाहर निकाला गया था। मई 2025 में रेवाड़ी शहर में कचरे के ढेर से करीब नौ महीने के शिशु का शव बरामद हुआ था।
स्थानीय दुकानदारों की सूचना पर पुलिस ने शव को कब्जे में लिया था। फरवरी 2024 में शहर के एक खाली प्लॉट में पॉलिथीन बैग में लिपटा करीब सात से आठ महीने का भ्रूण मिला था। इन घटनाओं ने इन्सानियत और सामाजिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े किए।
जुलाई 2023 में सेक्टर-4 में मिनी बाईपास के पास नाले के नजदीक कपड़े में लिपटी नवजात बच्ची रोती हुई मिली थी। ग्रामीणों और राहगीरों की सूचना पर उसे नागरिक अस्पताल में भर्ती कराया गया।
सितंबर 2020 में सेक्टर-5 में सड़क किनारे कपड़े में लिपटी नवजात बच्ची मिली थी। वहीं जनवरी 2016 में रेलवे जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर आठ पर बैग में लावारिस मिली नवजात बच्ची को अस्पताल के विशेष नवजात देखभाल केंद्र में भर्ती कराया गया था।
दिसंबर 2021 में कोसली क्षेत्र की नहर में पत्थर से बंधी नवजात बच्ची का शव मिलने की घटना भी सामने आई थी। हर घटना का स्थान और समय अलग था, लेकिन सवाल एक ही था कि मासूमों को इस हालत में छोड़ने के पीछे आखिर क्या परिस्थितियां थीं।
सवाल सिर्फ कानून का नहीं, समाज की संवेदनशीलता का भी: कैलाश
वरिष्ठ अधिवक्ता कैलाश चंद ने बताया कि नवजात को लावारिस छोड़ने के हर मामले के पीछे की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए बिना जांच किसी व्यक्ति या परिवार को दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन इन घटनाओं के बीच यह जरूरी है कि संकट में फंसे परिवारों तक सहायता पहुंचे और बच्चों की सुरक्षा के लिए उपलब्ध कानूनी व्यवस्थाओं की जानकारी आम लोगों को मिले।
असुरक्षित हालत में छोड़ने के बजाय मदद लें : अश्विनी
वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी तिवारी ने बताया कि नहर, कुएं, खाली प्लॉट और कचरे के ढेर पर मिलते मासूम यह याद दिलाते हैं कि बच्चों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनशीलता से भी जुड़ी है। किसी नवजात को असुरक्षित हालत में छोड़ने के बजाय उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस, अस्पताल और बाल कल्याण समिति की मदद ली जा सकती है।