न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) चंचल की अदालत ने मारपीट, रास्ता रोकने और जान से मारने की धमकी के एक मामले में नई आबादी निवासी आरोपी पति लक्ष्मीकांत और उनकी मां सुनीता को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि केवल मेडिकल सबूत ही आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
मेडिकल सबूत केवल पुष्टि करने वाले स्वभाव के होते हैं। वे यह तो दिखा सकते हैं कि चोटें मौजूद थीं लेकिन वे अपने आप में यह साबित नहीं करते कि उन चोटों के लिए आरोपी व्यक्ति ही जिम्मेदार थे। वर्ष 2020 में लक्ष्मीकांत और उनकी मां सुनीता के खिलाफ थाना शहर निवासी रेनू ने शिकायत दी थी।
आरोप लगाया था कि उनकी शादी 18 नवंबर 2013 को लक्ष्मीकांत के साथ हुई थी और कुछ समय बाद उनके बीच विवाद शुरू हो गए। 20 अगस्त 2020 को पति ने मारपीट की और अगले दिन 21 अगस्त को सास ने पीटा। साथ ही दोनों ने काम पर जाते समय रास्ते में रोककर फिर से मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।
पुलिस ने मामले की जांच कर अदालत में चालान पेश किया जिसके बाद आरोप तय किए गए और ट्रायल शुरू हुआ। अभियोजन पक्ष ने चार गवाहों को पेश किया जिनमें डॉक्टर, शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी शामिल थे। मेडिकल रिपोर्ट में शिकायतकर्ता को चोटें आने की पुष्टि हुई।
सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण कमियां सामने आईं
सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण कमियां सामने आईं। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने घटना के समय पुलिस को फोन करने के बावजूद मौके पर ही शिकायत दर्ज नहीं कराई और पहले काम पर चली गई जो उनके व्यवहार को संदिग्ध बनाता है। इसके अलावा कथित रूप से गला दबाने में इस्तेमाल दुपट्टा पुलिस को नहीं दिया गया और न ही उसे जब्त किया गया। घटनास्थल पर मौजूद पड़ोसियों को गवाह नहीं बनाया गया। न तो कोई हथियार बरामद हुआ और न ही शिकायतकर्ता के कपड़े जब्त किए गए।
ऐसे मामलों में स्वतंत्र गवाहों की गवाही महत्वपूर्ण
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में स्वतंत्र गवाहों की गवाही महत्वपूर्ण होती है जो इस केस में नहीं लाई गई। दोनों पक्षों के बीच पहले से पारिवारिक विवाद और अन्य मुकदमे चल रहे थे जिससे आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य जरूरी था। 9 अप्रैल को सुनाए फैसले में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसी आधार पर दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।