कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली-जयपुर हाईवे स्थित खेड़ा बॉर्डर पर आंदोलित किसानों ने सोमवार को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को महिला किसान दिवस के रूप में मनाया। इस दौरान मंच संचालन से लेकर आमसभा को संबोधित करने का दायित्व महिलाओं के हाथों में रहा। महिला वक्ताओं ने कहा कि आने वाले दिनों में दुनिया भर में सामाजिक, पर्यावरण व जलवायु संबंधी इंसाफ की लड़ाई महिलाएं ही लड़ेंगी, किसान आंदोलन में महिलाओं की मौजूदगी इस बात का प्रतीक है। किसान आंदोलन विश्व भर की महिलाओं के लिए प्रेरणा का काम कर रहा है। खेड़ा बॉर्डर किसानों के आंदोलन को 86 दिन हो गए हैं। दूसरी ओर रविवार को आमसभा को संबोधित करते समय जहरीला पदार्थ खाने वाले किसान की हालत में काफी सुधार बताया गया है। इसके साथ ही धरना स्थल पर रोजाना किसानों का आवागमन बना हुआ है। बता दें कि हाईवे स्थित खेड़ा बॉर्डर पर 13 दिसंबर से कृषि कानूनों के विरोध में राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र व पंजाब सहित अन्य प्रदेशों के किसानों द्वारा धरना दिया जा रहा है। संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर सोमवार को महिला किसान दिवस मनाया गया, जिसमें 500 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया।
खेती नहीं रहेगी तो रसाई कैसे चलेगी : वक्ता
आमसभा को संबोधित करते हुए महिला वक्ताओं ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि कानून किसानों की मर्जी के खिलाफ बनाए गए हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा इन कानूनों को वापस लेना चाहिए। लेकिन बेहद चिंता की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन कानूनों को प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में इंसानी गतिविधियों ने ग्लोबल वार्मिंग को जन्म दिया है और जीवों के कुदरती आवास को नुकसान पहुंचाया है। इन हालात में ऐसे आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका और उनकी अहमियत बहुत बढ़ गई है।
इन महिलाओं ने किया संबोधित
आमसभा को संबोधित करने वाली किसान महिलाओं में मंजुलता, रानी दुग्गल, सुमिता चतुर्वेदी , कुसुम साइवाल, कविता शर्मा, ईशा शर्मा, रचना, आफरीन, राजबाला यादव, विमला डांगी, कुसुम अधिवक्ता, संतोष, रुचि, परवीन, मंजू ओला, सोहनी देवी व रामकुमारी आदि शामिल रहीं। आमसभा का संचालन सुमित्रा चोपड़ा ने किया।