रेवाड़ी। यूक्रेन की सीमा पार करने से पहले घबराई हुई थी। खासकर कीव पर अटैक होते ही जान का खतरा डराने लगा था। सभी लोग दहशत में थे। बम के धमाके से हर बार सांसें अटक जातीं थीं। बड़ी मुश्किल से घड़ी कटी। उक्त बातें रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग में फंसी भारतीय छात्रा गरिमा ने कहीं हैं। वह अपने घर सकुशल लौट आई हैं।
गरिमा ने बताया कि वह कीव से काफी दूर चेरनिवस्ती शहर में पढ़ाई कर रही थीं। यह स्थान रोमानिया से कुछ ही दूरी पर है। इसकी वजह से वह जल्द ही स्वदेश लौट सकीं। लेकिन उन्हें डर था कि कीव की तरह चेरनिवस्ती पर भी हमला हो गया तो जान जा सकती है। गरिमा रेवाड़ी शहर के गढ़ी बोलनी रोड स्थित गुरुटैक सोसायटी की निवासी हैं।
गरिमा ने बताया कि 10 फरवरी के बाद जंग की चर्चा शुरू हो गई थी। 16 फरवरी को जंग शुरू होने की बात की जा रही थी। लेकिन 16 फरवरी के बाद तक सब कुछ नॉर्मल नजर आ रहा था। यूक्रेन के आम नागरिक सामान्य तरीके से जीवन जी रहे थे। उन्हें ही नहीं, बल्कि भारतीय छात्रों को भी लग रहा था कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। उन्होंने बताया कि 23 फरवरी को फिर से युद्ध की चर्चा शुरू हुई। 24 फरवरी को यूक्रेन से भारतीय छात्रों की फ्लाइट ने उड़ान भरनी थी, लेकिन इससे ठीक पहले जंग शुरू हो गई। इस वजह से छात्र यूक्रेन में ही फंस गए। सबसे ज्यादा खतरा तब हुआ, जब यूक्रेन की राजधानी कीव और खारकीव पर हमला शुरू हो गया।
खारकीव को दो दिन में ही बना दिया श्मशान
उन्होंने बताया कि रूसी सेना ने 2 ही दिन में खारकीव को श्मशान बना दिया। कीव भी अब श्मशान और खंडहर में तब्दील हो चुका है। हमले के कारण भारतीय छात्र सहमे हुए हैं। कीव में सबसे ज्यादा विद्यार्थी फंसे हुए थे। इनमें उसकी जान-पहचान के भी छात्र भी हैं।
भारतीय दूतावास के नोटिस के बाद आई सांस में सांस
भारतीय दूतावास का नोटिस आया कि उन्हें जल्द ही निकाल लिया जाएगा। गरमा ने बताया कि नोटिस के बाद सांस में सांस आई। चेरनिवस्ती और रोमानिया सीमा की दूरी बहुत कम है, जिसकी वजह से कुछ घंटे के अंदर वह सीमा पर पहुंच गईं। हालांकि भारतीय छात्र ही नहीं, बल्कि यूक्रेनियन भी पूरब से पश्चिम की तरफ रुख कर रहे थे, जिसकी वजह से सीमा पर भीड़ बढ़ गई थी। बावजूद इसके उन्हें यूक्रेन से निकालकर स्वदेश भेजा गया। गरिमा बताती हैं कि सबसे ज्यादा परेशानी उन भारतीय छात्रों को हो रही है, जो कीव और खारकीव में फंसे हुए हैं। वे बंकर में रहने को मजबूर हैं। कीव से रोमानिया बॉर्डर की दूरी भी काफी ज्यादा है। बहुत से छात्र भूखे-प्यासे घंटों पैदल चलकर बॉर्डर तक पहुंचे।