राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-11 के व अन्य सड़क निर्माण के नाम पर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की ओर से एक साल में करीब 20 हजार हरे पेड़ों को काटा जा चुका है, लेकिन चिंता का विषय यह है कि इन काटे गए पेड़ के बदले पौधरोपण के लिए वन विभाग के पास जिले में जमीन ही नहीं बची है। ऐसे में अब क्षतिपूर्ति पौधरोपण के नाम काटे गए पेड़ के बदले दूसरे जिला मेवात में पौधरोपण करना पड़ेगा।
एनएचआई की ओर से रेवाड़ी हरिनगर से लेकर महेंद्रगढ़ की सीमा तक एनएच-11 निर्माण के चलते पुरानी सड़क को फोरलेन करने का काम किया जाना है। सड़क किनारे की 20 हेक्टेयर जमीन से विभाग ने 10500 पेड़ काट डाले। इसके अलावा अन्य सड़कों को जोड़ दिया जाए तो अभी तक एक साल के दौरान 20 हजार से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। बाईपास की 7 हेक्टेयर, दिल्ली रोड, गढ़ी बोलनी रोड आदि को जोड़ दिया जाए तो बीते एक साल में जिला में 50 हेक्टेयर वन क्षेत्र घट चुका है। अर्थात वन क्षेत्र की जमीन सड़क निर्माण में चली गई।
4935 में से सड़क या रेलवे लाइन किनारे 3200 हेक्टेयर वन क्षेत्र
रेवाड़ी में ही नहीं पूरे प्रदेश में वन विभाग के पास सड़क किनारे वन क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा है। सड़क चौड़ीकरण या हाईवे निर्माण के समय इस वन क्षेत्र पर ही निर्माण करने वाली कंपनी आरी चलती है। पानीपत-रेवाड़ी एनएच-71 के दौरान भी लाखों पेड़ काटे गए थे। रेवाड़ी की बात करें तो वन विभाग के पास 4935 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। इसमें से 3200 हेक्टेयर सड़क, नहर व रेलवे लाइन किनारों का हिस्सा है। ऐसे में जिस तरह से हर साल सड़क निर्माण के नाम पर वन क्षेत्र कम होता जा रहा है, उससे आने वाले समय में आसपास के जिलों में क्षतिपूर्ति के नाम पर पौधरोपण की जगह नहीं बचेगी। बता दें कि रेवाड़ी में अरावली प्लांटेशन के नाम से भी 4240 हेक्टेयर जमीन है।
वन संरक्षण एक्ट के तहत काटे गए पेड़ के बदले पौध रोपण जरूरी
फारेस्ट कंजर्वेशन एक्ट(एफसीए) के तहत सड़क या अन्य निर्माण के लिए पेड़ कटाई के बदले पौधरोपण जरूरी है, लेकिन सवाल ये है कि जब जमीन ही नहीं बचेगी तो पौधरोपण होगा कहां पर। रेवाड़ी में एनएच-11 के लिए चौड़ीकरण इसका उदाहरण है। क्योंकि रेवाड़ी वन विभाग के पास वैकल्पिक जमीन नहीं होने पर मेवात जाना पड़ रहा है। लेकिन बड़ा सवाल है कि इसका लाभ यहां के लोगों को कैसे मिलेगा।
ग्रीन बेल्ट के लिए जमीन एक्वायर नहीं कर रही एनएचआई
वन क्षेत्र कम होने का एक बड़ा कारण यह भी है नेशनल हाईवे अथॉरिटी की ओर से पेड़ काटने के साथ सड़क निर्माण के लिए जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाता है। लेकिन ग्रीन बेल्ट के लिए जमीन अधिग्रहण नहीं की जाती है। एनएच- 8, एनएच-71 हो या फिर एनएच-11 सभी जगह अथॉरिटी की ओर से पेड़ काटकर पौधरोपण के लिए पैसा वन विभाग के पास जमा करा दिया गया। लेकिन सडक़ किनारे की ग्रीन बेल्ट खत्म कर उसके स्थान पर जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया। ऐसे में यदि पर्यावरण को बचाना है तो सडक़ निर्माण में लगी सड़क अथॉरिटी व सरकारों को ग्रीन सड़क निर्माण से पहले ग्रीन बेल्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण जरूरी करना चाहिए। ऐसा नहीं किया तो विकास के नाम पर वन क्षेत्र ही खत्म हो जाएंगे।
जमीन के अभाव में फारेस्ट एरिया बढ़ाना एक बड़ी चुनौती : डीएफओ
वन मंडल अधिकारी सुंदर सांभरिया ने कहा कि पेड़ कटने के साथ वन क्षेत्र भी कम होता जा रहा है। ऐसे में वन विभाग के सामने जमीन के अभाव में फारेस्ट एरिया बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है। इसके चलते ही हरियाणा फारेस्ट विभाग एग्रो फॉरेस्टी के अंदर गया है। इसके तहत किसानों को जागरूक कर उनकी जमीन पर पौधरोपण करवाया जा रहा है। इससे किसानों की आय भी बढ़ी है। रोहतक, झज्जर, सिरसा व हिसार में एग्रो फॉरेस्टी के तहत पौधरोपण करवाया गया है। एनएचआई को भी ग्रीन बेल्ट के लिए जमीन एक्वायर करनी चाहिए, ताकि पौधरोपण किया जा सके और वन क्षेत्र भी कम न हो। रेवाड़ी में पौधरोपण के लिए जगह नहीं होने के चलते ही मेवात में पौधरोपण किया जाना है।