रेवाड़ी। नयागांव निवासी अजीतानंद गिरि (50) महाकुंभ में जाकर नागा दीक्षा लेकर अब नागा साधु बन चुके हैं। निजी कंपनी में हेल्पर और मैनेजर के तौर पर काम करने वाले अजीतानंद का मन बचपन से ही मीराबाई की तरह भगवान श्री कृष्ण भक्ति की भक्ति में लगता था। अब उनका नागा साधु बनना क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
अजीतानंद गिरि ने नागा संस्कार की पूरी प्रक्रिया के विषय में जानकारी साझा हुए कहा कि मौनी अमावस्या के दिन उनका नागा संस्कार हुआ था। आह्वान अखाड़े से उनकी नागा दीक्षा हुई, जो चौबीस घंटे की कड़ी तपस्या थी। गंगा किनारे पर एक सौ एक डुबकी लगाकर उन्होंने अपनी तपस्या पूरी की थी। पांच साधुओं से नागा बनने के लिए पूरी प्रक्रिया होती थी। यह काफी कठिन होता है। 24 घंटे बिना खाए-पीये, तपस्या करनी पड़ती है।
हालांकि, इस दौरान अगर किसी को स्वास्थ्य संबंधी समस्या आती है तो इस स्थिति में विशेष सुविधा सरकार की तरफ से दी जाती है। तबीयत खराब होने पर सरकार की ओर से अस्पताल ले जाकर निशुल्क इलाज करवाया जाता है। साथ में अखाड़े के सदस्य भी होते हैं। कोई ज्यादा बुजुर्ग है तो उसे बीच में पानी पीने और चाय पीने को दे दिया जाता है। हालांकि है परिस्थितियों पर निर्भर करता है। घोर तप के बाद ही महाकुंभ के दौरान एक सामान्य सन्यासी नागा बनता है।
पिता हरियाणा पुलिस में थे डीएसपी
55 वर्षीय अजीतानंद गिरि ने बताया कि उनके पिता लल्लू राम हरियाणा पुलिस में डीएसपी रह चुके हैं। उन्होंने 12वीं कक्षा उत्तीर्ण की है। जेबीटी (प्राथमिक शिक्षक के लिए किया जाने वाला कोर्स) भी कर रहे थे, मगर इसमें कुछ खास सफलता नहीं मिल पाई। मां-बाप का स्वर्गवास हो चुका है। अभी घर पर उनकी पत्नी, दो बेटे और दो बेटियां हैं। इनमें तीन की शादी हो चुकी है। अभी एक लड़के की शादी होना बाकी है। दोनों लड़के अच्छी जगह नौकरी करते हैं। फिलहाल आर्थिक रूप से कोई समस्या नहीं है।
हलवाई, बिजली का काम भी जानते हैं अजीतानंद
अजीतानंद ने बताया कि वह गुरुग्राम की एक निजी कंपनी में पहले हेल्पर थे। उसके बाद काम करते-करते मैनेजर बन गए। कंपनी में विदेशी कपड़े तैयार किए जाते थे। हेल्पर में 6 हजार मिलते थे, उसके बाद 36 हजार मिलने लगे। पिताजी हमेशा कहा करते थे कि खुद अपने पैर पर खड़ा होना चाहिए। उसके बाद उन्होंने अपनी जिद पर कार्य किया। वह हलवाई, बिजली का कार्य भी जानते हैं।
संन्यासी बनने से पहले परिवार के सदस्यों से की चर्चा
अजीतानंद गिरि ने बताया कि हिसार के ओमानंद महाराज से वह काफी लंबे समय से जुड़े हुए थे। अब वह काकोडिया ठेका भूरथल आश्रम में रहेंगे। उनके दादा गुरु सेवागिरी महाराज हैं। गुरु गोविंद गिरि हैं। जब उन्होंने संन्यासी बनना था, उससे पहले परिवार के सभी सदस्यों से चर्चा की। सभी सदस्यों को समझाया, फिर जाकर अब नागा साधु बने हैं। अब जो परम सुख मिल रहा है वह किसी सपने से कम नहीं है।
नागा साधु बनने के बाद इन नियमों का भी करना होगा पालन
अजीतानंद ने बताया कि नागा साधु बनने के बाद वह अपने परिवार से मिलजुल नहीं सकते हैं। हां, अगर कोई आश्रम में आता है तो मिला जा सकता है। विवाह शादियों में भी नहीं जा सकते हैं। अगर वह शादियों में जाते भी हैं तो थोड़े समय के लिए ही वहां पर ठहर सकते हैं। उसके बाद उन्हें लौटना होगा।