पानीपत। कभी एक्रेलिक कंबल के लिए मशहूर पानीपत में इस कारोबार मंदा पड़ गया है। अब मिंक कंबल और कंबल वाली रजाई का कारोबार बढ़ गया है। पानीपत का एक्रेलिक कंबल व्यापार लगभग सिमट चुका है। दो हजार करोड़ रुपये का एक्रोलिक कंबल का कारोबार महज 50 करोड़ पर आ गया है। इसकी वजह से एक्रेलिक कंबल की उत्पादन लागत अधिक होना।
पिछले 15 साल में एक्रोलिक कंबल के 225 बड़े उद्योग बंद हो चुके हैं, इस कंबल का उत्पादन करने वाले सिर्फ 25 उद्योग ही बचे। बाकी ने एक्रेलिक की जगह मिंक और पोलर कंबल का उत्पादन शुरू कर दिया। पानीपत में इस वक्त मिंक कंबल के 100 उद्योगों में रोज 80 टन माल का उत्पादन हो रहा है। उद्यमी मिंक कंबल बनाने के लिए चीन से आधुनिक मशीनें ला रहे हैं। एक्रेलिक कंबल व्यापारियों की सरकार से मांग है कि इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए विशेष कदम उठाए जाएं।
एक्रेलिक कंबल के लिए धागा बनाने वाली 150 यूनिट हुईं बंद
जब एक्रेलिक कंबल के उद्योग ही बंद हुए तो इसके निर्माण के लिए धागा बनाने वाली 150 यूनिट भी बंद हो गईं। एक्रेलिक कंबल उद्यमियों को धागा मिलना भी बंद हो गया। इसलिए भी मिंक एवं पोलर कंबल के कारोबार के कारोबार को तेजी मिली। एक्रेलिक कंबल की उत्पादन लागत मिंक एवं पोलर कंबल के मुकाबले अधिक है। एक मशीन पर एक कारीगर तैनात करना पड़ता है। एक्रेलिक कंबल की कीमत 50 से 200 रुपये है, जिसे सिर्फ ओढ़ा जा सकता है जबकि पोलर कंबल को बेडसीट के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
760 करोड़ का पहुंचा कंबल वाली रजाई कारोबार
कंबल वाली रजाई के कारोबारी दीपक कुमार ने बताया कि कंबल उद्योग को नई तरह की रजाई से राहत मिली है। पिछले दो सालों के दौरान अधिकांश एक्रेलिक कंबल निर्माताओं ने अपना कारोबार ही बदल लिया है। अब वे मिंक और पोलर कंबल के साथ ही रजाई भी बनाने लगे हैं। कम कीमत की इस कंबल वाली रजाई की कीमत कम है और इसकी कीमत 300 रुपये से शुरू हो जाती है। इस रजाई के ऊपरी हिस्से का कपड़ा चीन से आता है, जबकि अंदर का हिस्सा पानीपत में ही बनता है। रजाई कारोबार करीब 760 करोड़ रुपये पहुंच चुका है। बीते पांच साल में रजाई निर्माण की 200 यूनिट खुल चुकी हैं। रजाई के ऊपरी हिस्से के कपड़े के 10 से 15 कंटेनर चीन से रोज आयात किए जा रहे हैं।
एक्रेलिक कंबल का उत्पादन बंद होने की कगार पर
कभी पानीपत की पहचान एक्रेलिक कंबल होता था। पानीपत से देश भर में एक्रेलिक कंबल की सप्लाई होती थी। दो हजार करोड़ रुपये से अधिक का एक्रेलिक कंबल का व्यापार था लेकिन अब ये कारोबार 50 करोड़ का रह गया है। उद्यमियों ने मिंक एवं पोलर कंबल की ओर रुख कर लिया। अब एक्रोलिक कंबल का आस्तित्व ही खतरे में आ गया है। - सुरेश गुंबर, प्रधान कंबल मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन
पानीपत। सुरेश गुंबर।- फोटो : Panipat