Documentary film shown on Neeraj Chopra, family hopes for two Olympic medals
- फोटो : Panipat
पानीपत। टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद नीरज चोपड़ा के परिवार को उनसे दो और ओलंपिक पदक जीतने की आस है। इसका खुलासा जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा के परिवार ने उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री में किया है। उनके चाचा भीम चोपड़ा ने कहा कि नीरज ने अपनी जीत से युवा खिलाड़ियों को नई राह दिखाई है। साथ ही खेल शुरू करने में आने वाली कठिनाइयों को दूर किया है।
डॉक्यूमेंट्री में नीरज चोपड़ा के खेल शुरू करने से लेकर ओलंपिक पदक जीतने तक की पूरी कहानी को दिखाया गया है। फ्री फायर स्टोरीज की ओर से बनाई गई इस डॉक्यूमेंट्री को नीरज चोपड़ा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भी साझा किया है।
डॉक्यूमेंट्री में नीरज चोपड़ा ने बताया है कि शुरुआत में किस तरह वे स्टेडियम से आने के बाद खेतों में जाकर डंडे फेंककर अभ्यास करते थे। उस वक्त उनके पास जैवलिन नहीं था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में खेल शुरू करने के 15 दिन तक उन्हें शरीर में काफी दर्द रहता था। रोज सोचते थे कि वह अभ्यास के लिए नहीं जाएंगे, लेकिन चाचा सुरेंद्र चोपड़ा उन्हें रोज स्टेडियम में छोड़कर आते थे। चाचा सुरेंद्र चोपड़ा ने बताया कि उनके मन में सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि नीरज को कुछ नया सिखाना है, जिसके लिए उसे खेल में लेकर गए थे। उन्होंने कहा कि नीरज गांव खंडरा का पहला जैवलिन थ्रोअर था। इससे पहले तो गांव में पता भी नहीं था कि यह कोई खेल है। डॉक्यूमेंट्री में नीरज चोपड़ा की मां ने बताया कि बेटे का फोकस हमेशा अपने खेल पर ही रहा। उसने परिवार एवं गांव के समारोह तक में जाना छोड़ दिया था। सारा ध्यान सिर्फ अपने खेल पर ही लगाकर रखा।
भैसों की पूंछ बांधने जैसी शरारत करते थे नीरज
परिवार के लोगों ने बताया कि नीरज बचपन में काफी शरारती थे। भैंसों की पूंछ आपस में बांध देना, चारा काटने वाली मशीन खराब कर देना जैसी उनकी शरारतों से लोग परेशान थे। स्टेडियम जाने के बाद धीरे-धीरे नीरज का ध्यान खेल पर केंद्रित हो गया। शरारतें कम होती चली गईं। पिता सतीश चोपड़ा ने बताया कि नीरज कभी हताश नहीं हुआ, चाहे उसे चोट लगी या फिर कभी मेडल नहीं आया। ओलंपिक में स्वर्ण पदक आने के बाद भी नीरज का व्यवहार सामान्य रहा।