चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक दोषी कर्मचारी को अनुशासनात्मक कार्यवाही शीघ्रता से पूरी करवाने का वैध अधिकार है। अनुचित और अस्पष्टीकृत विलंब मानसिक पीड़ा, आर्थिक कठिनाई और सामाजिक कलंक का कारण बनता है जो दोष सिद्ध होने से पहले दंड के समान है।
पंजाब राज्य विद्युत निगम लिमिटेड के एक कर्मचारी द्वारा पुन: परीक्षण लाभ की पूरी राशि जारी करने के लिए यह याचिका दायर की गई थी। उसे 2011 में निलंबित कर दिया गया था और सजा का आदेश साढ़े चार साल बाद पारित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि गंभीर आरोपों के कारण कार्यवाही जारी रह सकती है लेकिन बिना किसी औचित्य के लंबे समय तक विलंब करने से कार्यवाही रद्द करने का आधार बन जाता है।
अदालत ने कहा कि नियोक्ता को कार्यवाही पूरी लगन और बिना किसी अनावश्यक देरी के करनी चाहिए। लंबी जांच अनुशासनात्मक व्यवस्था के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती है। यह दक्षता, निष्ठा और जवाबदेही सुनिश्चित करने के बजाय व्यवस्था में अकुशलता और अविश्वास को जन्म देती है। नियोक्ता को किसी कर्मचारी पर अनिश्चित काल तक अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार लटकाए रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दंड प्राधिकारी ने निंदा की एक छोटी सी सजा दी है और साथ ही निलंबन की अवधि को देय अवकाश के रूप में माना जाने का आदेश दिया है।
अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए सक्षम प्राधिकारी को अवकाश नकदीकरण और ग्रेच्युटी सहित सभी सेवानिवृत्ति बकाया राशि को याचिकाकर्ता की सेवानिवृत्ति के दो महीने बाद गणना की जाने वाली विलंबित भुगतान पर 6 फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित जारी करने का निर्देश दिया।