चंडीगढ़। निरंकारी भवन पर धार्मिक समागम के दौरान ग्रेनेड हमले में तीन लोगों की मौत व 22 लोगों के घायल होने के मामले में आरोपी अवतार सिंह को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने डिफॉल्ट जमानत दे दी है। इसके साथ ही गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 व आईपीसी की अन्य धाराओं में दर्ज एफआईआर में जमानत याचिका दायर करने में हुई 1415 दिन की देरी को भी माफ कर दिया है।
हाईकोर्ट ने सह-आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत के आधार पर समानता के सिद्धांत और लगभग सात वर्षों की लंबी हिरासत को आधार बनाते हुए याची को यह लाभ दिया है। जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष निर्धारित 90 दिन की अवधि के भीतर चालान पेश करने में विफल रहा था। इसके बाद आरोपी अवतार सिंह और सह-आरोपी बिक्रमजीत सिंह ने संयुक्त रूप से डिफॉल्ट जमानत की अर्जी दाखिल की थी, जिसे इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि जांच की अवधि 180 दिन तक बढ़ा दी गई। हालांकि, बाद में अमृतसर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने यह स्पष्ट करते हुए समय बढ़ाने के आदेश को ही रद्द कर दिया कि सबडिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, अजनाला को 90 से 180 दिन तक अवधि बढ़ाने का अधिकार नहीं था।
समान परिस्थितियों में सह-आरोपी बिक्रमजीत सिंह ने हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्तूबर 2020 को उसे डिफॉल्ट जमानत दे दी थी। हाईकोर्ट ने माना कि अवतार सिंह की स्थिति पूरी तरह से बिक्रमजीत सिंह के समान है, क्योंकि दोनों की डिफॉल्ट जमानत की अर्जी एक ही आदेश से खारिज की गई थी। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी लगभग सात वर्षों से हिरासत में है। अब तक 128 में से केवल 60 गवाहों की ही गवाही हो सकी है जिससे यह स्पष्ट है कि मुकदमे के निपटारे में अभी काफी समय लगेगा।