चंडीगढ़। पहाड़ी क्षेत्र मोरनी में 40 हजार किसानों के नौतोड़ जमीन के मालिकाना हक के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार को झटका देते हुए आदेश दिया है कि सीमांकन व अन्य सभी कार्य फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर (एफएसओ) ही करेंगे। कोर्ट ने एफएसओ को निर्देश दिया है कि वह अपनी रिपोर्ट सरकार को जल्द से जल्द सौंपेंगे और सरकार 31 दिसंबर तक मोरनी को आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित करेगी। कोर्ट ने कहा कि मोरनी हिल्स चंडीगढ़-पंचकूला-मोहाली के लिए फेफड़ों के रूप में कार्य करते हुए प्रमुख हरित आवरण प्रदान कर रहा है और यह बेहद अहम है।
हाईकोर्ट ने एफएसओ को सर्वेक्षण, सीमांकन और मानचित्र तैयार करने के लिए आवश्यक दस्तावेज और सुविधाएं प्रदान करने का निर्देश दिया है। एफएसओ को राजस्व अधिकारियों, वन अधिकारियों और सर्वे ऑफ इंडिया से आवश्यक दस्तावेज प्राप्त करने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा, एफएसओ को उनके कर्तव्यों को पूरा करने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं और बुनियादी ढांचा प्रदान करने का निर्देश दिया गया है।
अधिसूचना जारी होने तक मोरनी हिल्स क्षेत्र में सभी गैर-वन गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी
कोर्ट ने आदेश दिया है कि अधिसूचना जारी होने तक मोरनी हिल्स क्षेत्र में सभी गैर-वन गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी। शिवालिक विकास मंच के अध्यक्ष विजय बंसल ने याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि लंबे समय से इस भूमि का मालिकाना हक देने की 40 हजार के करीब स्थानीय किसान मांग कर रहे हैं। वन विभाग ने कोर्ट में 2018 में झूठा शपथपत्र देकर बताया था कि नौतोड़ की समस्या के समाधान के लिए वन विभाग ने रिटायर्ड आईएफएस ऑफिसर एमपी शर्मा को 2 वर्ष के लिए फाॅरेस्ट सेटलमेंट अफसर नियुक्त कर दफ्तर समेत आवश्यक सुविधाएं मुहैया करवा दी हैं और उन्होंने काम भी शुरू कर दिया है। कोर्ट को बताया गया कि 59998 एकड़ भूमि अधिग्रहण का फैसला लिया गया था जिसके बाद कुल 50807 एकड़ भूमि का वनक्षेत्र के लिए मुआवजा देकर अधिग्रहण किया गया। इसके बाद भूमि के मालिकाना हक पर विवाद हुआ था। सरकार कह रही थी कि सीमांकन का काम राजस्व विभाग ही करेगा जबकि कोर्ट ने कहा कि यह काम एफएसओ का हैै।
कोर्ट ने सरकार की निंदा की
कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक सुस्ती और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की स्पष्ट अनिच्छा की निंदा करने के लिए हम खुद को बाध्य पाते हैं। लगभग चार दशक बीत जाने के बावजूद सीमांकन का काम पूरा न होना संबंधित अधिकारियों की वैधानिक और संवैधानिक विफलता है। ऐसे अधिकारियों की निष्क्रियता, विशेष रूप से ऐसे गहन सार्वजनिक महत्व के मामले में, इस न्यायालय की निंदा की स्पष्ट पात्र है।