चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि आरोपी को पेश किए बिना या सुनवाई का मौका दिए बिना चार्जशीट दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाना गैरकानूनी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा करना डिफॉल्ट बेल के अधिकार को खत्म करता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
जस्टिस रुपिंदरजीत चहल ने गुरदासपुर की विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें अभियोजन को चालान दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया था और आरोपियों की डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि चालान दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने से आरोपी के अधिकार सीधे प्रभावित होते हैं, इसलिए इस प्रक्रिया के दौरान आरोपी की भौतिक या वर्चुअल उपस्थिति अनिवार्य है।
याचिकाकर्ताओं को 7 मई 2025 को एनडीपीएस एक्ट के तहत अमृतसर के स्पेशल ऑपरेशन सेल द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 8 मई 2025 को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और वे लगातार हिरासत में रहे। कानून के अनुसार अभियोजन को 180 दिन में चालान दाखिल करना था लेकिन यह समय-सीमा पूरी हो गई। इसके बाद आरोपियों ने डिफॉल्ट बेल की मांग की जिसे 4 नवंबर 2025 को विशेष अदालत ने खारिज कर दिया।
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता समय संधावालिया ने दलील दी कि अभियोजन ने 30 अक्तूबर 2025 को समय बढ़ाने की अर्जी लगाई और 31 अक्तूबर 2025 को अदालत ने समय बढ़ा दिया लेकिन आरोपियों को कोई नोटिस नहीं दिया गया। हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का आदेश रद्द करते हुए आरोपियों को डिफॉल्ट बेल पर रिहा करने के निर्देश दिए।