23 साल की उम्र में युवा खेल और मौज मस्ती में डूबे रहते हैं। उनके शौक नई-नई जगह घूमने के होते हैं। लेकिन, हरियाणा के पंचकूला में सेक्टर-12 निवासी दृष्टि खरबंदा ने इस उम्र में परिपक्वता की मिसाल कायम की है। कोरोना काल में शिक्षा से दूर हुए गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। पड़ोस के लोगों ने हौसला तोड़ने का प्रयास भी किया, लेकिन आगे बढ़ती रही।
आज उनके पास रोजाना 120 बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। सभी बच्चे दृष्टि को प्यार से दीदी बुलाते हैं। दृष्टि ने बताया कि उनके दादा प्रोफेसर थे। उन्हीं से बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा मिली। इसके बाद माता रितु खरबंदा और पिता अजय खरबंदा ने पूरा सहयोग किया और हौसला बढ़ाया।
सेक्टर-12 निवासी बिजनसमैन अजय खरबंदा की बेटी दृष्टि ने बताया कि जब लॉकडाउन लगा तो लोग घरों में कैद हो गए थे। स्कूलों ने ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कर दी थीं। एक दिन पड़ोस की एक महिला ने कहा कि हमारे बच्चे तो ऑनलाइन पढ़ लेते हैं, मगर ये गरीब बच्चे सड़कों पर ही घूम रहे हैं। यह बात दृष्टि को बहुत चुभी और फैसला किया कि वो इन बच्चों को पढ़ाएंगी।
इसके बाद उन्होंने बच्चों को बुलाकर अपने घर के सामने पार्क में पढ़ाना शुरू कर दिया। जब ठंड का मौसम आया तो अपने घर के बरामदे में पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत में पड़ोस के लोगों ने कहा कि बच्चे बहुत शोर करते हैं। ये गंदगी फैलाएंगे। शरारत करेंगे तो कैसे रोकोगी।
इसी तरह की तमाम बातें दृष्टि को रोकने के लिए की गई, मगर मन में किए दृढ़ निश्चय के साथ वो आगे बढ़ती रहीं। दृष्टि के पास पढ़ने के लिए आने वाले सोनू, अजय, रवि और अन्य कई बच्चों ने बताया कि दीदी बहुत प्यार से पढ़ाती हैं। उन्हें स्कूल में पढ़ने में भी उतना मजा नहीं आता जितना दीदी की पाठशाला में आता है।
मदद मांगी तो लोगों ने बढ़ाए हाथ
कुछ ही दिन में जब पढ़ने के लिए आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो उन्हें अकेले संभाल पाना दृष्टि के लिए संभव नहीं था। इसलिए उसने फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुपों में लोगों से मदद मांगी। कोरोना के दौरान लोग फ्री थे तो मदद करने के लिए काफी लोग आगे आ गए। कुछ लोग पढ़ाने के लिए तो कुछ ने किताबों से भी मदद की। वर्तमान में 120 बच्चों को पढ़ाने का काम छह अध्यापक कर रहे हैं। दृष्टि ने कहा कि बच्चों को पढ़ाने से उन्हें संतोष का अनुभव होता है।
पढ़ाई के साथ अनुशासन भी सिखा रही
दृष्टि ने कहा कि जीवन में अनुशासित रहकर ही लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। इसलिए वो बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन का पाठ भी पढ़ाती हैं। कक्षा में बच्चे समय पर पहुंचते हैं और अपने बोर्ड लगाने और टाट बिछाने का काम करते हैं। बच्चे शरारत जरूर करते हैं मगर ऐसा कुछ नहीं करते जिससे कोई नुकसान हो जाए। घर के गार्डन में लगे फूलों को भी बच्चे नहीं तोड़ते हैं। किसी भी बच्चे को डांटने की जरूरत नहीं पड़ती। जो होमवर्क दिया जाता है उसे भी पूरा करते हैं।