चंडीगढ़। हाईकोर्ट के कर्मचारियों को अलॉट किए गए सरकारी मकानों की बदहाली और अलॉटमेंट के दौरान भेदभाव को लेकर एक अखबार में प्रकाशित समाचार पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए यूटी प्रशासन को नोटिस जारी कर दिया है। प्रशासन की ओर से एडवोकेट अभिनव सूद ने नोटिस स्वीकार किया है और इस मामले में प्रशासन को 11 नवंबर तक जवाब दाखिल करना है। समाचार के अनुसार हाईकोर्ट के कर्मचारियों को जो मकान अलॉट किए गए हैं उनमें टूटी दीवारें, उखड़ा पेंट और प्लास्टर हर जगह देखा जा सकता है। सेक्टर-22, 24, 27, 29, 33 और अन्य सेक्टरों में मौजूद इन सरकारी आवासों की छतें ढहने की कगार पर हैं। इससे यहां रहने वालों पर सीमेंट की धूल बरस रही है। दरवाजे और खिड़कियों के फ्रेम, जो कभी मजबूत हुआ करते थे, अब दीमकों द्वारा तबाह किए जा चुके हैं, मुश्किल से एक साथ टिके हुए हैं। आवासों के आसपास जंगली घास इतनी घनी है कि यह सांपों और अन्य खतरनाक जीवों का घर बन गई है। इससे कर्मचारियों को अपनी सुरक्षा को लेकर हमेशा डर बना रहता है।
स्थिति की गंभीरता दीवारों से रिसने वाले बदबूदार पानी से उजागर होती है। शौचालय, जो बुनियादी जरूरत है, गंदगी और सड़न के एक अपवित्र मिश्रण में तब्दील हो गया है। बाथरूम के दरवाजे अब टूटे हुए कब्जों पर लटके हैं। नलों से पानी नहीं बल्कि मुसीबतें निकलती हैं, रसोई की हालत भी इससे बेहतर नहीं है। खबर के अनुसार ये केवल घर नहीं हैं, बल्कि ढहते हुए अवशेष हैं जो कभी मेहनती कर्मचारियों को आश्रय और आराम प्रदान करने के लिए थे।
हालत किसी भी तरह से अमानवीय से कम नहीं है। घटिया मरम्मत कार्य ने केवल गंदगी को और बढ़ाया है। इन घरों में गंदगी और उपेक्षा शासन की उस छवि के बिल्कुल विपरीत है जिसकी उम्मीद संबंधित अधिकारियों से की जाती है। सिस्टम की सेवा करने वाले लोगों को खुद ही सम्मानजनक जीवन जीने के बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। ऐसे माहौल में जहां स्वच्छता और संरचनात्मक सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता, मौजूदा हालात एक घोर अन्याय है। इस समाचार को आधार बनाते हुए अब हाईकोर्ट ने यूटी प्रशासन से जवाब मांगा है।