चंडीगढ़। 16 वर्षीय छात्र के अपहरण और नृशंस हत्या के बेहद संवेदनशील मामले में दो दोषियों की मृत्युदंड की सजा को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए उनके शेष प्राकृतिक जीवन तक के लिए कारावास में परिवर्तित कर दिया और इसमें सामान्य रिहाई या स्वत: छूट का दावा नहीं हो सकेगा।
अदालत ने कहा कि दोषियों के मृत्युदंड पर अंतिम निर्णय से पहले उन्हें तीन साल तक एकांत कारावास में रखा गया जो अवैध था, यह मानवीय जीवन व गरिमा के अधिकार का उल्लंघन था और मृत्युदंड की सजा को कम करने का आधार है। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने अमेरिकी लेखक रिक ब्रैग के कथन का प्रयोग करते हुए कहा कि हर जीवन एक निश्चित गरिमा का अधिकारी है, चाहे उसे ढोने वाला खोल कितना ही क्षतिग्रस्त क्यों न हो।
14 फरवरी 2005 को 16 वर्षीय छात्र अभि वर्मा उर्फ हैरी का अपहरण कर फिरौती में 50 लाख रुपये की मांग की गई। अगले दिन उसका शव खेतों से बरामद हुआ। इस मामले में 21 दिसंबर 2006 को होशियारपुर की सेशन कोर्ट ने विक्रम सिंह उर्फ विक्की वालिया और जसबीर सिंह उर्फ जस्सा को फांसी की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने 2008 में और फिर 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों दोषियों की मृत्युदंड की सजा की पुष्टि कर दी थी। इसके बाद वर्षों तक दया याचिकाओं, समीक्षा याचिकाओं और सांविधानिक याचिकाओं का दौर चलता रहा।
खंडपीठ ने विस्तार से स्पष्ट किया कि मृत्युदंड पाए व्यक्ति का भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और गरिमा का अधिकार बना रहता है। यदि दया याचिकाओं के निपटारे में अत्यधिक देरी, अवैध एकांत कारावास या अमानवीय व्यवहार साबित होता है, तो मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। दोषियों को दया याचिका के अंतिम निर्णय से पहले अलग-थलग रखना या मृत्यु-कोठरी में रखना कानूनन अस्वीकार्य है।
हाईकोर्ट ने रिकाॅर्ड से यह पाया कि दोषियों को 3 साल तक अन्य कैदियों से अलग रखा गया, जो न्यायालयों द्वारा तय मानकों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि मृत्युदंड के बाद के चरण में अपराध की गंभीरता के बजाय यह देखा जाता है कि क्या राज्य ने दोषियों के साथ सांविधानिक और मानवीय व्यवहार किया या नहीं। कोर्ट ने कहा कि दोषी के अधिकारों की रक्षा करना, पीड़ित की पीड़ा को कमतर आंकना नहीं है, बल्कि कानून के शासन को जीवित रखना है।