चंडीगढ़। चंडीगढ़ पंजाबी मंच इस जज्बे के साथ लड़ रहा है कि एक दिन मां बोली पंजाबी को उसका सम्मान जरूर मिलेगा। जब तक पंजाबी भाषा का रुतबा बहाल नहीं हो जाता, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। यह बात मशहूर लेखक व साहित्यकार पद्मश्री सुरजीत पातर ने कही। इससे पहले चंडीगढ़ पंजाबी मंच की ओर से रोष मार्च निकाला। यह मार्च सेक्टर-19 से शुरू होकर सेक्टर-17 प्लाजा में समाप्त हुआ।
मंच के प्रधान सुखजीत सिंह ने कहा कि 1 नवंबर 1966 को रातों रात चंडीगढ़ की स्थानीय बोली पंजाबी को अलग करके अंग्रेजी को सरकारी भाषा और दफ्तरी भाषा का रुतबा दे दिया गया, जो गलत है। चंडीगढ़ पंजाबी मंच ने पेंडू संघर्ष कमेटी, समूह गुरुद्वारा प्रबंधक संगठन, पंजाबी लेखक सभा सहित कई अन्य संगठनों के प्रतिनिधि रोष मार्च में शामिल हुए। उन्होंने काला दिवस मनाते हुए एलान किया कि पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक को पंजाबियों का बनता हक देना पड़ेगा। नहीं तो संघर्ष और तेज किया जाएगा।
इस मौके पर लखविंदर जौहल, महासचिव देवी दयाल शर्मा, बाबा साधु सिंह बाबा गुरदियाल सिंह, जोगिंदर सिंह बुड़ैल, गुरप्रीत सिंह सोमल, बलकार सिद्धू, दीपक शर्मा चनारथल आदि मौजूद रहे। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में चंडीगढ़ के आसपास के गांवों के लोग भी थे, जो काले झंडे लिए हुए थे। पीयू के विद्यार्थी नेता भी इसमें शामिल हुए।
दिल्ली हिंसा का आरोपी लक्खा सिधाना भी पहुंचा
इस रोष मार्च में 26 जनवरी पर लाल किले पर हुई हिंसा का आरोपी लक्खा सिधाना भी शामिल हुआ। लक्खा पर दिल्ली पुलिस ने एक लाख रुपये का इनाम भी रखा है। पुलिस की फाइलों में वह फरार है। हालांकि वह सोशल मीडिया के माध्यम से आए दिन अपनी बात समर्थकों तक पहुंचाता रहता है। किसानों के प्रदर्शन में भी शामिल होता रहता है। लक्खा पर चंडीगढ़ में दंगा फैलाने की कोशिश के आरोप में केस दर्ज है।