चंडीगढ़। हरियाणा में अब प्रदेश और केंद्र के कोई भी विभाग, निगम और बोर्ड अपनी मर्जी से विकास परियोजनाओं के लिए जमीन का चयन और अधिग्रहण नहीं कर सकेंगे। जमीन चिन्हित करने से पहले सभी को नगर व ग्राम आयोजना विभाग से सलाह लेनी होगी। इसके बाद ही प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो सकेगा। इस संबंध में नगर व ग्राम आयोजना विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने सभी विभागों, निगमों और बोर्डों को पत्र लिखा है।
सभी विभागों के अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों, एमडी एचएसआईआईडीसी, फरीदाबाद और गुरुग्राम के विकास प्राधिकरण के सीईओ, हाउसिंग बोर्ड, एचएसएमबी, एनएनएआई समेत हरियाणा पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन समेत अन्य को पत्र भेजा है।
पत्र में कहा गया है कि विशेष रूप से बाईपास, परिधि सड़कें, लिंक सड़कें, राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और अन्य परियोजनाएं प्रावधानों के तहत तैयार की गई विकास योजनाओं के योजना प्रस्तावों पर विचार किए बिना कार्यान्वित की जा रही हैं। जबकि इससे पहले विकास योजना तैयार की जाती है, जिसे जिला योजना समिति, जिला स्तरीय समिति के समक्ष रखा जाता है, जिसकी अध्यक्षता संबंधित उपायुक्त करते हैं। इसके बाद योजना को नगर एवं ग्राम नियोजन मंत्री की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय समिति के समक्ष भी रखा जाता है। विकास योजना तैयार करने में जिला स्तर से लेकर प्रशासनिक सचिव स्तर तक सभी विभागों का परामर्श मांगे जाते हैं। बावजूद इसके सरकार के संज्ञान में आया है कि विभाग के योजना प्रस्ताव में कानून का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। मुख्य सचिव के पत्र का हवाला देते हुए सभी विभागों, निगमों और बोर्डों को निर्देश दिए हैं कि प्रदेश में कोई बुनियादी ढांचा परियोजना या किसी भी अन्य परियोजना को नगर व ग्राम आयोजना विभाग की पूर्व सलाह के बिना शुरू न करें। साथ ही किसी भी स्थल का चयन करने या भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू करने या भूमि अधिग्रहण के लिए एनओसी जारी करने से विभाग की सलाह जरूरी है।
निकाय संस्थाएं सीधे नहीं खरीद सकेंगी सामान
हरियाणा में शहरी स्थानीय निकाय संस्थाएं अब सीधे ओपन मार्केट से कुटेशन के आधार पर वस्तुओं और सेवाओं की खरीद नहीं कर सकेंगी। शहरी स्थानीय निकाय निदेशालय ने इस पर रोक लगाते हुए निर्देश दिए जारी कि भविष्य में सभी संस्थाओं को केंद्र सरकार के ई मार्केट पैलेस (जीईएम) पोर्टल के माध्यम से आनलाइन खरीद करनी होगी। गौर हो इससे पहले जरूरत के अनुसार, निगम, परिषद और नगर पालिका स्थानीय स्तर ही सामान की खरीदारी करती थी। इस खरीद में गड़बड़ी की शिकायतें सरकार के पास पहुुंची थी, इसी के चलते यह फैसला लिया गया है।