(सर फोटो ट्रैक में सेव है)
प्यार में पड़ा था कुंडली का पंगा, उसमें भी पास
कुछ ऐसी थी पार्षद गुरबख्श रावत और उनके पति बीरेंद्र रावत की प्रेम कहानी
बस अड्डे पर मिले और कॉफी हाउस में पक्का हुआ प्यार
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। कांग्रेसी पार्षद गुरबख्श रावत और बीरेंद्र सिंह रावत का प्यार परवान चढ़ा तो कुंडली का भी पंगा हुआ। बीरेंद्र रावत के पिता ने कहा कि कुंडली मिलेगी तो शादी होगी। इसके बाद कुंडली मिलाई गई तो दोनों के गुण मिल गए और फिर शादी हुई। बस अड्डे में आंखें चार हुईं और कॉफी हाउस में प्यार पक्का हो गया।
दोनों की बस अड्डे पर पहचान हुई और फिर चल पड़ी प्यार की गाड़ी। गुरबख्श रावत और उनके पति बीरेंद्र रावत बताते हैं कि वर्ष 1999 में एक दूसरे की मुलाकात सेक्टर 17 के बस अड्डे पर हुई थी। उस समय गुरबख्श रावत बीएससी फाइनल ईयर में सेक्टर 11 के गवर्नमेंट कॉलज फॉर गर्ल्स में पढ़ाई कर रही थीं। गुरबख्श रावत का कहना है कि उन दिनों कंप्यूटर कोर्स करना चाहती थी। एक दोस्त ने कहा कि मुझे पता है कि एक मेरे दोस्त हैं जो कई संस्थानों में कंप्यूटर कोर्स करवाते हैं। फिर सेक्टर 17 में बस अड्डे पर मुलाकात हुई। गुरबख्श रावत ने बताया कि उसके बाद मेरे दोस्त ने उनसे मिलवाया। वे बीरेंद्र रावत ही थे। उन्होंने मुझे अच्छी तरह से कोर्स करवाया। काफी केयर की तो इसके बाद मेरी बात और मुलाकात दोनों बढ़ती गईं।
बीरेंद्र रावत ने बताया कि बस अड्डे पर पहली मुलाकात के बाद सेक्टर 15 में अपने स्कूटर पर बैठाकर कॉफी पी और बातें हुईं। दोस्ती परवान चढ़ती गई और साथ ही प्यार भी। हम दोनों पत्नी-पत्नी तो हैं ही दोस्ती भी पुरानी है।
बीरेंद्र रावत का कहना है कि जब दोस्ती हो गई तो कॉलेज के सामने ही लाला लाजपत राय भवन में हर रोज मुलाकात होती। उस समय मोबाइल फोन तो थे नहीं इसलिए एसटीडी पर बात होती थी। हम बात करने के लिए एक दिन पहले ही रूटीन तय कर लेते थे। दोस्ती के डेढ़ वर्ष बाद शादी की। रोज गार्डन में भी हम दोनों काफी देर तक बैठकर बातें करते थे। रोज गार्डन के गुलाब और लाला लाजपत राय भवन दोनों ही हम दोनों के प्यार के गवाह हैं।