फोटो संख्या:82- दुकान के अंदर रखीं पुस्तकें--संवाद
महेंद्रगढ़। जिले के अधिकांश निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों की बजाय निजी प्रकाशकों की पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं। निजी प्रकाशकों की किताबें मार्केट में नहीं मिलने से अभिभावकों को भी मजबूवश उन्हीं स्कूलों से किताबें खरीदनी पड़ती हैं। हर साल कक्षा बढ़ने के साथ-साथ अभिभावकों पर भी किताबें खरीदने के लिए आर्थिक भार बढ़ रहा है।
निजी स्कूलों में डायरी व टाई-बेल्ट और ड्रेस के लिए भी या तो बाजार की दुकानें निर्धारित हैं या फिर स्कूलों में ही दो गुणा रेटों पर उपलब्ध करा दी जाती हैं। स्कूलों का यह खेल कक्षा यूकेजी से ही शुरू हो जाता है। अनेक स्कूलों में तो बैग भी उपलब्ध कराए जाते हैं। एनसीआरटी की किताबों की अनिवार्यता के बावजूद भी अनेक कोर्सों के लिए निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लगाकर अभिभावकों से पैसा लिया जाता है। इन्हीं पुस्तकों को अगर बाजार से खरीदने जाएं तो यह पुस्तकें बाजार में उपलब्ध नहीं होती।
पक्के बिल तक नहीं दे पाते हैं दुकानदार
निजी स्कूलों की ओर से निर्धारित दुकानों पर इनका कमीशन भी तय होता है। जब अभिभावक इन दुकानदारों से पक्का बिल मांगते हैं तो यह जीएसटी का हवाला देते हुए किताबों के रेटों में वृद्धि का हवाला देकर अभिभावकों को टरका देते हैं। स्कूलों में अभिभावकों को बता दिया जाता है कि यह किताबें शहर के किस पुस्तक विक्रेता के पास मिलेंगी। अनेक पुस्तकें तो निजी स्कूलों द्वारा ऐसी निर्धारित कर दी जाती हैं जो स्कूलों के अलावा बाहर पुस्तकों की दुकानों पर मिलती ही नहीं। यह भी निजी स्कूलों की कमाई का एक जरिया है।
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इस प्रकार के मामले की जांच के लिए जिलास्तर पर कोई कमेटी नहीं होती। एनसीईआरटी की जांच कमेटी नियमित रूप से इस तरह की जांच करती है। शिक्षा विभाग की ओर से आदेश आए तो खंड स्तर पर भी जांच कमेटी का गठन किया जा सकता है।
-अलका, खंड शिक्षा अधिकारी, महेंद्रगढ़।