कनीना। बाबा मोलड़नाथ मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन राजा परीक्षित की कथा सुनाई गई। कथा व्यास दाशानूदास प्रवेश शास्त्री ने कहा कि जन्म-जन्मांतर एवं युग-युगांतर में जब पुण्य का उदय होता है तो ऐसा अनुष्ठान होता है। कथा सुनने से पापी भी पाप मुक्त हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि वेदों का सार युगों-युगों से मानवजाति तक पहुंचाता रहा है। भागवत पुराण उसी सनातन ज्ञान की कथा है जो वेदों से प्रवाहित होती चली आई है। भागवत महापुराण को वेदों का सार कहा गया है। उन्होंने कहा कि युद्ध में गुरु द्रोण के मारे जाने से क्रोधित होकर उनके पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। ब्रह्मास्त्र लगने से अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ। परीक्षित जब बड़े हुए नाती-पोतों से भरा पूरा परिवार था। सुख वैभव से समृद्ध राज्य था। वह जब 60 वर्ष के थे तो एक दिन वह क्रमिक मुनि से मिलने उनके आश्रम गए। आवाज लगाई लेकिन तप में लीन होने के कारण मुनि ने कोई उत्तर नहीं दिया।
राजा परीक्षित स्वयं का अपमान मानकर निकट मृत पड़े सर्प को क्रमिक मुनि के गले में डाल कर चले गए। अपने पिता के गले में मृत सर्प को देख मुनि के पुत्र ने श्राप दे दिया कि जिस किसी ने भी मेरे पिता के गले में मृत सर्प डाला है। उसकी मृत्यु सात दिनों के अंदर सांप के डसने से हो जाएगी। इस मौके पर ठेकेदार अशोक, दीपक चौधरी, राजेंद्र, अनिल, दीपक, दिनेश यादव, राजेंद्र सिंह, अनिल कुमार, इंद्रजीत, शिव कुमार, लाल सिंह सहित आदि मौजूद रहे।