महेंद्रगढ़। कानौड़िया ब्राह्मणों ने महेंद्रगढ़ को आबाद किया था। इसके पहले महेंद्रगढ शहर कानौड़ के नाम से जाना जाता था। सत्रहवीं शताब्दी में मराठा शासक तात्या टोपे ने यहां एक किले का निर्माण करवाया था। 1861 में पटियाला रियासत के शासक महाराज नरेंद्र सिंह ने पुत्र मोहिंद्र सिंह के सम्मान में इस किले का नाम महेंद्रगढ़ रख दिया था। इसी किले के नाम कि वजह से इस शहर को महेंद्रगढ़ के नाम से जाना जाने लगा। इस किले से एक भूमिगत सुरंग थी जो नारनौल एवं माधोगढ़ के किले में पहुंचती है, लेकिन देखरेख के अभाव में अब खंडहर हो गया।
महेंद्रगढ़ एक ऐसा ऐतिहासिक नगर है जो अपने भीतर कई कहानियां समेटे हुए है। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो कई किस्से-कहानियां मिलेंगी। जो महेंद्रगढ़ के गौरव की गवाह हैं। शहर में बहुत सारी इमारतें हैं जो इसी तरह के किस्से-कहानियों, किरदारों को खुद में समेटे हुए हैं। उन्हीं में से एक है यहां की ऐतिहासिक बावड़ी जो राजा महाराजा के समय की है और इसमें अनेक कुएं हुआ करते थे जिनसे पानी भरा जाता था और इसमें राज घराने के लोग स्नान किया करते थे। न सिर्फ ऐतिहासिक नजरिए से बल्कि ये बावड़ी इंजीनियरिंग का भी बेहतरीन नमूना है जिस तरीके से सैंकड़ों साल पहले इस बावड़ी का निर्माण किया गया और ये भवन निर्माण का अद्भुत नमूना है। लेकिन समय बदला और आज इनको संभालने वाला कोई नहीं है। अब यह बावड़ी खंडहर होती जा रही है। इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
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पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो
ऐतिहासिक धरोहर देखरेख के अभाव में खंडहर हो रही है। यहां के लोगों ने मांग की है कि पुरातत्व विभाग देखरेख करके पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करे। पुरातत्व विभाग बावड़ी का जीर्णोंद्धार कर देता है तो यहां पर पर्यटक आएंगे। इससे लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
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