महेंद्रगढ़ जिले की अटेली तहसील के अंतर्गत बसा कांटी गांव प्राचीन व ऐतिहासिक होने के साथ-साथ आजादी के आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले महान स्वंतत्रता सेनानियों की धरा है। 'ब्रिटिशर्स रूल इन इंडिया' पुस्तक के अनुसार, कांटी गांव की स्थापना बर्डोद के राजा बीरड देवजी उर्फ बीरडेजी राणा के बड़े बेटे बीसेजी राणा उर्फ बसेशर सिंह ने विक्रम संवत् 1260 (1203 ई.) में वार मंगलवार बैशाख शुद्धि दूज के दिन की थी। इसे पूर्व में कन्हेरी के नाम से जाना जाता था, बाद में इस गांव का नाम कांटी खास पड़ा तथा अंततः कांटी पड़ा।
अलवर रियासत के दौरान कांटी में 45 गांवों का मुख्यालय व थाना था। इस गांव के वीर योद्धा ठाकुर साहेब रामबक्श सिंह चौहान अलवर रियासत में प्रशासक थे। उन्होंने 18वीं के अंतिम दशक में गांव में एक महलनुमा हवेली का निर्माण करवाया था, जिसे धौली कोटडी के नाम से जाना जाता है, जहां से वे कांटी 45 के राजस्व संग्रहण व प्रशासनिक देख-रेख का कार्य करते थे। उन्होंने अलवर के बाला किले के प्रसिद्ध चांदपोल दरवाजे पर घोड़े पर चढ़कर थपकी लगाई थी।
आज भी गांवों में होती हैं चर्चाएं
झज्जर रियासत के दौरान ठाकुर साहेब हुकम सिंह चौहान अपनी बुर्जो वाली कोटडी के समीप में स्थित कचेहरी (कोर्ट) में न्यायपालिका से जुड़े केसों का निपटारा करते थे। नाभा रियासत के दौरान यह गांव परगना तथा एक कस्बे के तौर पर विकसित था। यहां बड़ा बाजार होता था तथा उस समय अटेली का कोई अस्तित्व नहीं था। इस गांव के ठाकुर मोहर सिंह चौहान नाभा रियासत में जिलाधीश (नाजम) थे। उस समय न्यायपालिका, कार्यपालिका व राजस्व विभाग को मिलाकर एक ही जिला स्तर का प्रशासनिक विभाग होता था। उनके साहसिक, निष्पक्ष व न्यायसंगत फैसलों की आज भी गांव में चर्चाएं होती हैं।
अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे
पूर्व में इस क्षेत्र को ‘राठ’ के नाम से जाना जाता था, जिसके बारे में एक कहावत मशहूर थी कि ‘काठ नवे पर, राठ नवे ना’। गांव के शहीद ठाकुर दलेल सिंह चौहान, अपने अनेक साथियों के साथ नसीबपुर के ऐतिहासिक मैदान में सन् 1857 की क्रांति में रेवाड़ी (रामपुरा) के राजा राव तुलाराम जी के नेतृत्व में श्योबक्श राय, राव किशन गोपाल, राव कृष्ण सिंह, राव रामलाल, मोहम्मद आजिम, समद खां आदि स्वतंत्रता सेनानियों के साथ, अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी शहादत के प्रतीक के तौर पर गांव में एक छतरी व चबूतरा निर्मित है।
अपने पदों को ताक पर रख आजादी की गतिविधियों में हिस्सा लिया
आजादी के आंदोलनों के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं जैसे- डॉ. डी.के बरूआ (पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, कांग्रेस), शोभाराम (पूर्व सीएम, मत्स्य संघ), सेठ दामोदर स्वरूप, जय नारायण व्यास (पूर्व संविधान सभा के सदस्य), बृष भान (पूर्व सीएम पेप्सू) आदि का अक्सर गांव में आगमन होता था। उनकी रैलियों और नुक्कड़ सभाओं में लोग बढ-चढक़र हिस्सा लेते थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर, गांव के ठाकुर रामस्वरूप सिंह नम्बरदार व ठाकुर रघुबीर सिंह नम्बरदार ने अपने नम्बरदारी के पदों की परवाह न करते हुए, कांग्रेस पार्टी ज्वॉइन कर जीवन पर्यन्त स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। इनके अतिरिक्त अनेक गुमनाम लोगों ने अपने पदों को ताक पर रखकर आजादी की गतिविधियों में हिस्सा लिया।
कांटी से छीन ली थी चौघराहट
यहां के लोगों ने आजादी मिलने तक स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने का सिलसिला जारी रखा। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह व बृष भान (पूर्व सीएम, पेप्सू) के प्रजा मंडल आंदोलन में कांटी के पंडित सूर्य देव, डॉ. उमराव सिंह, मास्टर श्याम मनोहर शर्मा, रामेश्वर सिंह, मास्टर रामजी लाल टेलर, बाबू राम (रि. स्टेशन मास्टर), कमला देवी आदि लोगों ने शामिल होकर आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांव के सिपाही ज्ञानचंद यादव व जगमाल सिंह चौहान 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चुशूल घाटी (रेजांगला) में देश के लिए शहीद हुए। देश की आजादी के आंदोलनों व गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के कारण, अंग्रेजों द्वारा कांटी से चौधराहट छीन ली गई थी।