सरकारी अस्पतालों में एक तरफ चिकित्सकों की भर्ती नहीं हो रही है तो दूसरी तरफ उससे अधिक छोड़कर जा रहे हैं। अगर जिले की बात की जाय तो दो वर्षों में 11 चिकित्सक त्यागपत्र दे चुके हैं। जबकि उनकी जगह पर छह ही ज्वाइन किए हैं। आखिर सरकारी अस्पतालों से चिकित्सक क्योें त्यागपत्र देकर अपना स्वयं का अस्पताल खोलने या फिर निजी अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हरियाणा सिविल मेडिकल एसोसिएशन सर्विस का माने तो सरकार की पॉलिसी से चिकित्सक खुश नहीं हैं। इसी वजह से वे छोड़कर जा रहे हैं।
एसोसिएशन बोर्ड के एडवाइजरी सदस्य डॉ. पवन कुमार ने बताया कि चिकित्सक पीजी तथा सुपर स्पेशलिस्ट का कोर्स करते हैं। लेकिन सरकार उन चिकित्सकों को कागजी कार्रवाई में लगा दिया जाता है। इस वजह से उनका क्लीनिकल अभ्यास छूट जाता है। चिकित्सक कागजी कार्रवाई या प्रशासनिक कार्य के लिए यह कोर्स नहीं करते हैं। वह मरीजों का इलाज करने के लिए कोर्स करते हैं। चिकित्सकों को घर पर मरीज देखने की अनुमति नहीं है। अगर घर पर अभ्यास की छूट मिल जाए तो चिकित्सक क्लीनिकली अभ्यास से जुड़ा रहता है और मोटिवेट तथा अपडेट रहता है। उन्होंने बताया कि चिकित्सक को सुपर स्पेशलिस्ट कोर्स करने की जल्दी से अनुमति नहीं मिल पाती। सरकार की इन्हीं पॉलिसी की वजह से चिकित्सक अस्पताल में रुकते नहीं हैं।
11 चिकित्सक दे चुके हैं त्यागपत्र
जिला अस्पताल से मिली जानकारी के अनुसार पिछले दो वर्षों में दस से अधिक चिकित्सक सरकारी अस्पताल से त्यागपत्र दे चुके हैं। इनमें से लगभग छह से सात चिकित्सक जिला अस्पताल नारनौल से, दो चिकित्सक नांगल चौधरी, एक चिकित्सक महेंद्रगढ़, दो चिकित्सक कनीना से छोड़कर गए हैं। नारनौल से तो गायनोलॉजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ, फिजिशयन त्यागपत्र दे चुके हैं। दो वर्ष बीतने के बाद अभी तक फिजिशियन नहीं आ पाया है। इनमें चार-पांच चिकित्सक ऐसे हैं जो मात्र डेढ़ से दो सरकारी अस्पताल में सेवा दी थी।
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राजस्थान में है यह पॉलिसी
हरियाणा सिविल मेडिकल सर्विस एसोसिएशन के एडवाइजरी बोर्ड के सदस्य डॉ. पवन कुमार ने बताया कि चिकित्सकों के लिए राजस्थान राज्य की पॉलिसी हरियाणा से बेहतर है। यही कारण है कि वहां चिकित्सक स्थायी रहते हैं। उन्होंने बताया कि चिकित्सकों को वहां पर नॉन अभ्यास अलाउंस नहीं मिलता। उसकी बजाय घर पर मरीज देखने की अनुमति मिली हुई है। पॉलिसी के अनुसार एमबीबीएस चिकित्सक दो वर्ष की सर्विस देने के बाद पीजी कर सकता है और बांड की राशि मात्र पांच लाख रुपये है। विशेेषज्ञ चिकित्सक का अलग से कॉडर बनाया गया है। विशेषज्ञ को कागजी कार्रवाई कोई नहीं दी जाती। वो केवल क्लीनिकल काम ही करते हैं।
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प्रदेश में है यह पॉलिसी
चिकित्सकों को मूल वेतन का 20 प्रतिशत नॉन अभ्यास अलाउंस दिया जाता है। उन्हें घर पर मरीज देखने की अनुमति नहीं है।
-यहां पर चार वर्ष की सर्विस के बाद पीजी करने की अनुमित मिलती है। बॉन्ड की राशि 50 लाख रुपये कर दी गई है।
-विशेषज्ञों का अलग से कोई कॉडर नहीं बना है।
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एसोसिएशन ने यह रखी थी मांग
हरियाणा सिविल मेडिकल सर्विस एसोसिएशन कई दिनों से अपनी मांग उठा रही है। जनवरी में सरकार के सामने तीन मांगें रखी गई थीं। सरकारी प्रवर चिकित्सा अधिकारी (एसएमओ) की सीधी भर्ती न करें। विशेषज्ञ चिकित्सकों का अलग से कॉडर बनाया जाए तथा पीजी पॉलिसी संशोधित की जाए। लगभग एक महीने का समय बीत गया है, पर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है।
वर्जन
मैंने सुपर स्पेशलिस्ट का कोर्स की हूं, पर वहां पर मैं अभ्यास नहीं कर पा रही थी। इसलिए मैंने त्यागपत्र दे दिया। सरकार की पॉलिसी ठीक नहीं है। एमबीबीएस, स्पेशलिस्ट, सुपर स्पेशलिस्ट सभी चिकित्सकों को एक ही वेतन दिया जाता है। जबकि सुपर स्पेशलिस्ट चिकित्सक ऑन कॉल 24 घंटे उपलब्ध होते हैं। निजी अस्पतालों में भी काम के हिसाब से ही पैसा मिलता हैैै। सरकार को भी काम के हिसाब से पैसे देना चाहिए। स्पेशलिस्ट एवं सुपर स्पेशलिस्ट चिकित्सक दस्तावेजों में उलझा कर रह जाएंगे तो वे अभ्यास कैसे करेंगे। डॉ. रितु शर्मा, गायनोलॉजिस्ट।
वर्जन
अगर सरकार को अस्पतालों में स्थायी चिकित्सक चाहिए तो पॉलिसी बदलनी होगी। स्पेशलिस्ट चिकित्सकों का अलग से कॉडर बनाना होगा। चिकित्सकों को अभ्यास के लिए समय देना होगा। कागजी कार्रवाई में उलझाने से बात नहीं बनेगी। -डॉ. पवन कुमार, सदस्य, एडवाइजरी बोर्ड, हरियाणा सिविल सर्विस एसोसिएशन।