गर्भवती महिलाओं में क्षय रोग (टीबी) का काफी हद तक समय पर पता नहीं चलता है। इसलिए खासकर गर्भवती महिलाओं को इसके प्रति जागरूक रहना बेहद जरूरी है। गर्भावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों का टीबी महामारी पर प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान प्रतिरक्षात्मक परिवर्तन इस वर्ग में नए संक्रमणों के साथ-साथ अप्रत्यक्ष संक्रमणों की सक्रियता को अधिक सामान्य बना देते हैं। यह जानकारी जिला सिविल सर्जन डॉ. संत लाल वर्मा ने दी।
उन्होंने कहा कि महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे परिवार में टीबी रोगी की देखभाल करें, जिसके कारण टीबी के निदान से पहले या बाद में उनके संपर्क में आने से वे टीबी की चपेट में आ जाती है और खाना पकाने के लिए ठोस जैव ईंधन के उपयोग के साथ-साथ गरीबी, वेंटिलेशन की कमी आदि से टीबी का खतरा बढ़ जाता है।जिला सिविल सर्जन ने बताया कि इसी को ध्यान में रखते हुए आमजन को गर्भवती महिलाओं में क्षय रोग के लक्षणों एवं उपचार के बारे में जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा निरंतर जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से आमजन व महिलाओं को टीबी के लक्षणों व इससे बचाव को लेकर जानकारी प्रदान की जाती है।
कहा कि सरकार द्वारा टीबी रोगियों की सुविधा के लिए निक्षय पोषण योजना, सूचना प्रोत्साहन योजना, उपचार समर्थक योजना और निजी प्रदाता अधिसूचना योजना नामक चार योजनाएं चलाई जा रही है, जिसके तहत टीबी रोगियों और उनकी देखभाल करने वालों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। टीबी से संबंधित किसी भी जानकारी के लिए राज्य टोल फ्री नंबर 1800-11-6666 पर संपर्क कर सकते हैं। आशा वर्कर एवं एएनएम आमजन को टीबी के बारे शिक्षित करने और इससे जुड़ी भ्रांतियों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इस बीमारी के प्राथमिक लक्षण बुखार, खांसी, वजन कम होना, पसीना आना है जो कि कोविड-19 के लक्षणों के समान है। यह बीमारी संक्रामक है, हालांकि अगर मरीज का 15 दिनों तक इलाज किया जाए है तो यह फैलती नहीं है।