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Kurukshetra News: कलाकारों ने छोड़ी लोक संस्कृति की छाप तो गदगद हुए दर्शक

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कुरुक्षेत्र। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के चलते मुख्य कार्यक्रमों के अंतिम दिनों में पवित्र ब्रह्मसरोवर तट लोक संस्कृति का महाकुंभ बन चुका है। विभिन्न राज्यों से आए कलाकार अपने-अपने प्रदेशों की लोक संस्कृति की छाप छोड़ रहे हैं तो वहीं चारों ओर हरियाणा प्रदेश के कोने-कोने से लुप्त होने के कगार पर पहुंचे वाद्ययंत्रों की धुनें भी गूंज रही है।
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सोमवार को भी मथुरा के कलाकारों ने मयूर नृत्य व बरसाना की लठमार होली खेलने की प्रस्तुति से पर्यटकों को गदगद कर दिया तो वहीं हिमाचल के कलाकारों ने सिरमोरी नाटी व छाऊ नृत्य से समां बांध दिया। असम का बागुरुंबा नृत्य तो महाराष्ट्र का धनगरी गजा नृत्य देखकर भी पर्यटक खुशी से झूम उठे। यही नहीं सहभागी देश तंजानिया व प्रदेश ओडिशा के कलाकारों ने भी अपनी-अपनी कला का बखूबी प्रदर्शन कर लोक संस्कृति से रूबरू करवाया। लोक कलाकारों ने अपने वाद्ययंत्रों की धुनों से ब्रह्मसरोवर की फिजा को बदल दिया। कहीं जंगम जोगी, कहीं नगाड़ा-बीन और कहीं सारंगी की धुनों को सुनकर पर्यटक मस्ती से झूमते रहे, जिसके साथ ही रंग-बिरंगे, चमकते परिधानों में सजे कलाकारों संग पर्यटक सेल्फी लेते रहे। महोत्सव लुप्त हो रही कलाओं का संगम भी बना है। इन्हीं तमाम पहलुओं को लेकर ही सरकार के कला एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग की तरफ से जंगम जोगी के ग्रुप, डेरू पार्टी के ग्रुप, नगाड़ा पार्टी के ग्रुप, बीन पार्टी के ग्रुप बुलाए गए है। इन सभी ग्रुपों के करीब 250 लोक कलाकार महोत्सव में पहुंचे हैं। ये सभी कलाकार सरोवर के चारों तटों पर घूम-घूम कर पर्यटकों का मनोरंजन कर रहते रहे।


मुख्य कार्यक्रमों के अंतिम दिनों में बढ़ी भीड़
महोत्सव भले ही 28 नवंबर से शुरू हुआ लेकिन पहले दिनों में पर्यटक बेहद कम संख्या में ही पहुंचे। पांच दिसंबर से शुरू हुए मुख्य कार्यक्रमों के बाद पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी जबकि 11 दिसंबर तक चलने वाले इन कार्यक्रमों के अंतिम दिनों में पर्यटकों की संख्या में और इजाफा हुआ। शनिवार व रविवार को लाखों पर्यटक पहुंचे।
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