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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष : गीता की धरती कुरुक्षेत्र, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने 5160 साल पहले दिया था पूरी मानवता के लिए अमर संदेश

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कुरुक्षेत्र। गीता ज्ञान संस्थानम में श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर दिखाया जा रहा लाइट एंड साउंड शो। स
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कुरुक्षेत्र। जिस धरा पर करीब 5160 साल पहले भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, वहीं धर्मनगरी आज सर्वश्रेष्ठ ज्ञान संग्रह बन चुकी है। श्रीकृष्ण जी भविष्य में होने वाली बुराइयों से पहले से ही अवगत थे, जिसके लिए अर्जुन को माध्यम बनाकर सभी मानव जाति के कल्याण के लिए अमर संदेश दिया था। भारतीय परंपरा में गीता वही स्थान रखती है जो उपनिषद और धर्मसूत्रों का है। श्री कृष्ण द्वारा दिए इस ज्ञान के कारण ही अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो सका था।
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भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने थे। जब युद्ध भूमि में अर्जुन विपक्ष में उन्हीं के परिवार को खड़ा देख मोह से घिर गया। गीता के उपदेश द्वारा भगवान ने युद्ध भूमि में अर्जुन के टूटे हुए मनोबल को जोड़ने का भी काम किया था जिसके पश्चात अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो गए थे और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे। भगवान श्रीकृष्ण के इन उपदेशों का आत्मसात किए धर्मनगरी आज भी पूरी मानवता के लिए यह संदेश दे रही है, जिसकी प्रासंगिता विदेशों में भी दिखाई देने लगी है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन करने के लिए हर देश आतुर दिखाई पड़ने लगा है।





धर्मनगरी की विशेष पहचान है ब्रह्मसरोवर स्थित श्रीकृष्ण अर्जुन रथ

पवित्र ब्रह्मसरोवर के तट पर पुरुषोत्तमपुरा बाग स्थित श्रीकृष्ण-अर्जुन रथ धर्मनगरी की विशेष पहचान बना हुआ है। यहां आने वाला हर पर्यटक रथ को देखने पहुंचता है तो वहीं सेल्फी भी लेते हैं। इसी के साथ पर्यटक बच्चों को इसके थीम के बारे में भी समझाते हैं। कॉपर कलर के इस रथ को गत वर्ष ही सुनहरा रंग किया गया था जो ब्रह्मसरोवर की खूबसूरती को बढ़ा रहा है।
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महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता उपदेश देने के दौरान की रथ की यह प्रतिमा कांस्य धातु से बनी हुई है, जो 35 फुट ऊंची है। इसका वजन 45 टन है। इसे बनाने में दो करोड़ रुपये खर्च हुए थे। रथ के ऊपरी भाग पर हनुमान जी विराजमान हैं। इस मूर्ति में शैव्य, सुग्रीव, मेघवाहन और पुष्कर नामक चार घोड़ों द्वारा खींचे जा रहे रथ को दर्शाया गया है। रथ को देखते ही हर पर्यटक गदगद हो उठता है। इसी रथ के पास ही हवन यज्ञ के साथ अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव का शुभारंभ किया जाता है, जिसमें आज तक कई राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्री आहुतियां डाल चुके हैं।




रथनुमा श्रीकृष्ण-अर्जुन मंदिर में विराजी जाएगी विश्व की सबसे बढ़ी गीता
जिस ज्योतिसर तीर्थ पर भगवान श्रीकृष्ण ने 5160 वर्ष पहले गीता अमर संदेश दिया था उसी के समीप इस्कॉन की ओर से गुरु-शिष्य पर आधारित रथनुमा श्रीकृष्ण-अर्जुन मंदिर का निर्माण किया गया है। करीब 200 करोड़ की लागत से छह एकड़ एरिया में बनाए जा रहे इस मंदिर में इटली में तैयार की गई विश्व की सबसे बड़ी गीता विराजी जाएगी। इस गीता का वजन एक हजार किलोग्राम है तथा 670 पृष्ठ हैं, जिनका साइज 2.84 गुणा व 2.0 मीटर है। यह सिंथेटिक के मजबूत कागज से तैयार की गई है, जिसके कवर को स्वर्णिम धातु से तैयार किया गया है। इसके पन्ने मशीन द्वारा ही पलटे जा सकेंगे।




लाइट एंड साउंड शो देख कृष्ण लीलाओं से रोमांचित हो उठते हैं पर्यटक
ज्योतिसर तीर्थ पर हर रोज हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। जिस वटवृक्ष के नीचे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश दिया, माना जाता है कि वही वटवृक्ष आज भी ज्योतिसर में मौजूद है। देश और दुनिया के तमाम स्थानों से लोग इसके दर्शन करने आते हैं। तीर्थ पर करीब छह करोड़ खर्च कर लाइट एंड साउंड शो शुरू किए गए, जोकि महाभारत थीम पर आधारित है। वहीं दूसरा शो भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप पर दर्शाया जाता है, जिसमें गीता का संदेश साक्षात दिए जाने का अनुभव होता है। इस शो को देख हर कोई कुछ समय के लिए महाभारत के प्रवेश में पहुंच जाता है और बहुत आनंदित महसूस करता है।


श्रीकृष्ण और महाभारत के हर लम्हे को संजो रही धर्मनगरी

कुरुक्षेत्र। श्रीकृष्ण और महाभारत की यादों को आज भी धर्मनगरी में संजोकर रखा गया है। वह चाहे ज्योतिसर हो ब्रह्मसरोवर हो या फिर गीता ज्ञान संस्थानम्। भगवान श्रीकृष्ण के विचारों और आदर्शों के मद्देनजर ही धर्मनगरी में 1987 में श्रीकृष्ण संग्रहालय की स्थापना की गई थी, जिसे देख पर्यटक श्रीकृष्ण की हर लीला, स्वरूप व उनके दिए संदेश से रूबरू हो रहे हैं।

यह विश्व का एकमात्र संग्रहालय है, जहां श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के साथ महाभारत के हर बड़े क्षण को चित्रित किया गया है। ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु व आंध्रप्रदेश से प्राप्त काष्ठ मूर्ति शिल्प का एक बड़ा संग्रह है। काष्ठ कलाकृतियों में ओडिशा से प्राप्त 18-19वीं सदी की शैली में निर्मित चार काष्ठ फलक हैं। यहां प्रदर्शित पांडुलिपियों में गुरुमुखी में लिपिबद्ध दुर्लभ योग वशिष्ठ, फारसी में लिखित चित्रित भागवत पुराण, फारसी लिपि व ब्रजभाषा में लिखा गया चित्रित भागवत, संस्कृत में लिखी भगवद्गीता, महाभारत (अश्वमेघ पर्व) और भागवत की 18-19वीं सदी की पांडुलिपि सम्मिलित है।
इसमें श्रीकृष्ण, महाभारत और कुरुक्षेत्र पर आधारित साक्ष्यों के अलावा उत्तर प्रदेश के मथुरा, हिसार के राखीगढ़ी, फतेहाबाद जिले के बनवाली से मिले पुरातात्विक अवशेष सुरक्षित रखे गए हैं। गीता ज्ञान संस्थानम में जहां भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित म्यूजियम बनाया गया है तो वहीं श्री कृष्ण कृपा मंदिर भी तैयार किया गया है, जिसे देखने हजारों पर्यटक रोजाना पहुंचते हैं। ये संस्थान गीता पर शोध का पहला विशाल केंद्र व गुरुकुल होगा। प्रदेश का यह एकमात्र मंदिर है, जिसमें एक साथ 32 देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मुख्य प्रतिमा राधा-कृष्ण की है। गीता ज्ञान संस्थानम स्वामी ज्ञानानंद के नेतृत्व में तैयार किया गया है। यहां गीता व गाय के साथ भारतमाता की प्रतिमा भी स्थापित की है।

कुरुक्षेत्र। गीता ज्ञान संस्थानम में श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर दिखाया जा रहा लाइट एंड साउंड शो। स

कुरुक्षेत्र। गीता ज्ञान संस्थानम में श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर दिखाया जा रहा लाइट एंड साउंड शो। स

कुरुक्षेत्र। गीता ज्ञान संस्थानम में श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर दिखाया जा रहा लाइट एंड साउंड शो। स

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