कुरुक्षेत्र के रण में भाजपा लगाएगी हैट्रिक या फिर आप और इनेलो पलटेगी बाजी। 2014 में पहली बार कमल खिला था। 2019 में दूसरी जीत के बाद हैट्रिक के लिए जोरआजमाइश की जा रही है। आंकड़ों में इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। पिछली दो बार से भाजपा उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है।
कुरुक्षेत्र के चुनावी रण में इस बार किसके सिर ताज सजेगा, यह तो 25 मई को मतदाता तय करेंगे। इससे पहले इस युद्ध में उतरे महारथियों ने अपनी-अपनी जीत के लिए पसीना बहाना शुरू कर दिया है। सुबह से लेकर देर रात तक मुख्य पार्टियों की ओर से चुनावी रण में उतारे गए योद्धा अपने-अपने तरकश से तीर निकालकर एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
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महारथियों के साथ संबंधित राजनीतिक पार्टियों की निगाहें भी सियासी महाभारत पर टिकी हुईं हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो इस सीट पर पूर्व में कांग्रेस का दबदबा रहा है, लेकिन पिछले दो लोस चुनाव से यह सीट भाजपा के खाते में रही है। खास बात यह है कि इस बार कांग्रेस ने गठबंधन के तहत इस सीट को आप के खाते में दिया है।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा इस सीट पर भाजपा हैट्रिक लगाती है या फिर कांग्रेस के समर्थन से आप का परचम लहराता है, या फिर दोनों को पछाड़ कर इनेलो के प्रत्याशी एकबार फिर मैदान मारने में कामयाब होते हैं।
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कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट 1977 में अस्तित्व में आई थी। अब तक हुए 12 लोकसभा चुनावों में यहां कांग्रेस का ही दबदबा नजर आता था। यहीं नहीं इससे पहले कैथल लोकसभा क्षेत्र रहते हुए भी कांग्रेस को ही लगातार तव्वजो मिली है। 1957 में मूल चंद जैन, 1962 में देवदत्त पुरी और उनके बाद 1967 एवं 1971 में गुलजारी लाल नंदा इस क्षेत्र से सांसद बने थे।
ये सभी उम्मीदवार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ही उतारे थे। कुरुक्षेत्र लोकसभा बनते ही वर्ष 1977 में जनता पार्टी के रघुवीर सिंह विर्क तो उनके बाद 1980 में जनता पार्टी सेक्युलर के मनोहर लाल सैनी सांसद बने थे।
इसके बाद इस सीट पर कांग्रेस ने 1984, 1991, 2004 और 2009 में जीत हासिल की थी, जबकि भाजपा का कमल यहां पहली बार वर्ष 2014 के चुनाव में 37 साल बाद पहली बार खिला था। तब राजकुमार सैनी इनेलो के बलबीर सैनी को मात देकर विजेता बने थे जबकि कांग्रेस की ओर से लगातार दो बार सांसद बनने का रिकॉर्ड बनाने वाले नवीन जिंदल पिछड़ते हुए इस चुनाव में तीसरे नंबर पर आ गए थे।
भाजपा ने अपनी जीत का सिलसिला 2019 के चुनाव में भी बरकरार रखा। इस बार भाजपा ने चेहरा बदलते हुए सैनी समाज के ही नायब सैनी को मैदान में उतारा था, जिन्होंने कांग्रेस के निर्मल सिंह को पछाड़ते हुए जीत हासिल की थी। नायब सैनी अब प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में भाजपा ने इस बार कांग्रेस के पुराने दिग्गज नवीन जिंदल पर दांव लगाया है, जबकि इनेलो से अभय चौटाला ताल ठोक रहे हैं।
पहली बार इस सीट पर कांग्रेस मैदान में नहीं
यह पहला मौका है जब इस सीट पर कांग्रेस सीधे तौर पर मैदान में नहीं उतरी है। उनकी ओर से इंडिया गठबंधन में सहयोगी आप के लिए सीट छोड़ दी गई है। यह भी पहला ही मौका है जब आम आदमी पार्टी प्रत्याशी इस सीट पर प्रमुख उम्मीदवार है। यहां से पार्टी ने अपने प्रदेशाध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सुशील गुप्ता को चुनावी योद्धा बनाया है।
कैलाशो सैनी ने दो बार किया इनेलो का झंडा बुलंद : प्रो. कैलाशो सैनी ही ऐसी नेत्री रहीं, जिन्होंने यहां एक साथ कई रिकाॅर्ड दर्ज बनाए। वे यहां से आज तक एकमात्र महिला सांसद रहीं हैं। उन्होंने 1998 और फिर अगले ही वर्ष 1999 के चुनाव में यहां से जीत दर्ज की और इनेलो का झंडा बुलंद किया। वर्तमान में कैलाशो भाजपा के पाले में हैं।