कुरुक्षेत्र। कथा में प्रवचन देते कथावाचक कृष्ण चंद्र शास्त्री ठाकुर। विज्ञप्ति
कुरुक्षेत्र। श्री जयराम संस्थाओं के परमाध्यक्ष ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी के सान्निध्य में आयोजित भागवत पुराण की कथा के तीसरे दिन व्यासपीठ कथावाचक कृष्ण चंद्र शास्त्री ठाकुर ने संगीतमयी शैली में कहा कि परमात्मा के साथ प्राणी कोई भी संबंध बना सकता है। परमात्मा प्राणी के हर भाव को समझते हैं, परंतु वह अपने ही मोह-माया के जाल में परमात्मा के वास्तविक रूप को नहीं पहचानता। कथा के शुभारंभ से पूर्व व्यासपीठ का पूजन किया गया।
कृष्ण चंद्र ठाकुर ने कथा में हिरण्यकश्यप के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि ख्याति के साथ मानव का लोभ बढ़ता जाता है और इसी लोभ और लालच के कारण मानव विनाश के रास्ते पर चल निकलता है। उन्होंने कथा में बताया कि एक बार पृथ्वी को भी अभिमान हो गया था लेकिन परमात्मा ने अपनी लीला से पृथ्वी को उसके अभिमान का अहसास कराया और इसी लीला में पृथ्वी को वृंदावन के दर्शन हुए। कथावाचक कृष्ण चंद्र ठाकुर ने कहा कि पूरी धरती पर प्रलय होती है लेकिन वृंदावन में नहीं, वृंदावन न तो धाम है और न ही तीर्थ लेकिन वृंदावन परमात्मा का अपना घर है।
वृंदावन के वास्तविक दर्शन आध्यात्मिक दृष्टि से ही होते हैं। आधुनिक युग में भी वृंदावन में परमात्मा के दर्शन हैं। उन्होंने बताया कि भागवत में बताया गया है कि मनुष्य के पुत्र का जिस प्रकार होना आवश्यक है, उसी प्रकार पुत्री का होना भी जरूरी है। पुत्री के पालन पोषण से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।
उन्होंने बताया कि हमारे वेद पुराण भी इस बात के गवाह हैं कि प्राचीन वैदिक काल में नारियां भी विदुषी होती थी। उन्होंने बताया कि मनुष्य जीवन में साधना आवश्यक है। साधना से ही चिंतन का निर्माण होता है, चिंतन से प्राणी वंदनीय होता है, साधना से प्राप्त किए गए धन के समान कोई अन्य धन नहीं है।
उन्होंने कथा में इस प्रसंग में रावण और भगवान शंकर के संबंधों का भी उल्लेख किया। संगीतमयी कथा में श्रद्धालु बार-बार नाचने को मजबूर हुए। इस अवसर पर कथा सुनने के लिए पूर्व विधायक एवं कांग्रेस जिला अध्यक्ष मेवा राम भी पहुंचे।
कुरुक्षेत्र। कथा में प्रवचन देते कथावाचक कृष्ण चंद्र शास्त्री ठाकुर। विज्ञप्ति