बर्फ पिघलाकर पीया पानी, तिरंगे के कारण बची जान
यूक्रेन से सुमी से लौटे यमनदीप की दास्तान सुन नम हुई परिजनों की आंखें
संवाद न्यूज एजेंसी
शाहाबाद। यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान सबसे बड़े खतरे के क्षेत्र सुमी में फंसा गांव रतनगढ़ का निवासी यमनदीप शुक्रवार को सकुशल अपने घर लौट आया। यमनदीप ने जब परिजनों को आपबीती सुनाई तो सभी दंग रह गए। कई दिन तक भूखे रहना पड़ा। इस दौरान बर्फ पिघलाकर पानी पीया। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के कारण जान बच सकी।
यमनदीप ने बताया कि यूक्रेन का सुमी राज्य रूस के बिल्कुल नजदीक है। युद्ध के दूसरे दिन ही वहां रेलवे ट्रैक व सड़कों को ध्वस्त कर दिया गया। उसके साथ भारत के करीब 700 छात्र फंसे थे। युद्ध के बीच सभी 15 दिनों तक सूमी में रहे। भारतीय एंबेसी के अनुसार 25 फरवरी की उनकी फ्लाइट थी, लेकिन 24 फरवरी को रूस ने हमला कर दिया। युद्ध के कारण सुमी के हालात इतने दयनीय हो गए थे कि वहां खाना-पानी सब कुछ खत्म हो चुका था, जिस कारण उन्हें भूखे ही रहना पड़ा और बर्फ को पिघला कर पानी पीना पड़ा।
चारों तरफ बमबारी थी और मौत के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था। सबसे खतरे का मंजर तब था जब एक मिसाइल उनके बंकर से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर आकर गिरी। उसका धमाका आज भी कानों में गूंजता है। उस मिसाइल से आसपास का क्षेत्र ध्वस्त हो गया और सौभाग्य से ही उसकी जान बची है। यमनदीप ने बताया कि सुमी से पोलैंड तक पहुंचने के लिए उन्हें करीब 1400 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ा। दो घंटे का 175 किलोमीटर का सफर तय करने में 12 घंटे लगे।
लबीब से पोलैंड का 888 किलोमीटर का सफर 30 घंटे में तय किया, जब कहीं जाकर वह पोलैंड पहुंचे और उनकी जान में जान आई। इस सफर के दौरान उनके मोबाइल बंद करा दिए गए और किसी तरह की लोकेशन शेयर न करने की सख्त हिदायत दी गई। घर वापसी पर पिता हरबीर नरवाल, माता सुरिंद्र चहल, कर्मबीर नरवाल, सुरेंद्र, जोगेंद्र, परमजीत, गुरमीत व रमनदीप सहित बड़ी संख्या में गांव वासियों ने यमनदीप का स्वागत किया।
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यूक्रेन के शिक्षकों ने भी उठाए हथियार
यमनदीप ने बताया कि युद्ध के चलते यूक्रेन सरकार ने वहां के 18 वर्ष से 60 वर्ष के लोगों को देश छोड़ने पर पाबंदी लगा दी। इस पर उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी हथियार उठाने पड़े।