गीता समाधान है, संविधान है और गीता स्वाभिमान है। महाभारत की भूमि में भगवान कृष्ण ने पांच हजार वर्ष पहले जब दुनिया को गीता का संदेश दिया था। उस वक्त भी श्रीमद्भागवत गीता प्रासंगिक था और आज उससे भी अधिक प्रासंगिक है। वर्तमान विश्व व समाज की सभी समस्याओं का हल श्रीमद्भागवत गीता में निहित है। इस ग्रंथ को जीवन में अपनाकर ही विश्व का कल्याण संभव है। ये प्रवचन गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने दिए। वे वीरवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन केंद्र व युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग की ओर से विश्व शांति स्थापना में श्रीमद्भागवत गीता की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। इस मौके पर स्वामी ज्ञानानंद महाराज, कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा, मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने शिक्षिका सरिता आर्य की पुस्तक का विमोचन भी किया। स्वामी ज्ञानानंद ने कहा कि श्रीमद्भागवत गीता व्यक्ति को जीवन में सही निर्णय लेने में मदद करती है। जब व्यक्ति के निर्णय सही होते है तो तभी परिणाम भी सही मिलते हैं। आज दुनिया में जिस तरह से मूल्यों का क्षरण हुआ है, ऐसे समय में पूरी मानवता को मजबूत व सशक्त बनाने के लिए विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के लिए गीता का अध्ययन जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा हमारा स्वाभिमान है। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि इस विरासत को संभाले व बच्चों को इस विरासत संभालने के लिए प्रेरित करें। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि केडीबी के मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने कहा कि कुरुक्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं है तथा गीता के कारण कुरुक्षेत्र की विश्व पटल पर अमिट पहचान बन चुकी है। इस अवसर पर इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, मारीशस, यूएसए से भी बधाई संदेश की लघु फिल्म प्रदर्शित की गई। कार्यक्रम में देश-विदेश से बड़ी संख्या में गीता विद्वतजन ऑनलाइन माध्यम से भी इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से जुड़े। इस अवसर पर युवा एवं सांस्कृतिक विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया, साक्षी महाराज, प्रो. आरके देसवाल, डॉ. भगत सिंह, प्रो. राजपाल, प्रो.विभा अग्रवाल, डॉ. विजय कुमार, डॉ.परमेश कुमार, डॉ. कुसुम, प्राचार्य डॉ. जोशी सहित अन्य मौजूद रहे।
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि वैदों का सार गीता के अंदर है। उपनिषदों का सार भी गीता में है। हमारे युवा, हमारे लोग छोटी-छोटी बातों से व्यथित हो रहे हैं, डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। यह अपेक्षाओं के कारण होता है। हम काम बाद में करते हैं अपेक्षा पहले करते हैं। इसलिए अपेक्षाओं से ऊपर उठकर कार्य करना चाहिए। हमें कर्म करना चाहिए फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। समत्व ही योग है। उन्होंने कहा कि गीता को केवल पढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि गीता को आचरण में ढालने की जरूरत है।
इस्कान के गोपाल कृष्ण महाराज ने कहा कि वर्तमान में पूरे विश्व में अंशाति बढ़ रही है, जिससे हमारे समाज तथा मन में सकारात्मकता की कमी आ रही है। इसका मुख्य कारण अज्ञानता है। गीता पूरे मानव समाज को दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है, जिससे आत्मसात करके इस अज्ञानता को दूर किया जा सकता है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. सुधीर आर्य ने कहा कि पूरे विश्व पर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। आज सब देश अपने आपको शक्तिशाली बनाना चाहते हैं। विश्व शांति के लिए व युद्ध से बचने के लिए हमें गीता को जीवन में धारण करना होगा। अहिंसा, त्याग, शांति, सहयोग, दया, सत्य, किसी की चुगली न करना, सीखना, धैर्य को धारण करना, नीति के अनुसार चलना सब गीता में निहित है। गीता किसी व्यक्ति की वस्तु नहीं ये सभी को साथ लेने वाला ग्रंथ है।