नेशनल हाईवे 152 हिसार-चंडीगढ़ स्थित थाना व सैनी माजरा प्लाजा पर 353 दिन से चल रहा किसानों का धरना सोमवार को समाप्त हो गया। किसानों के उठते ही टोल प्लाजा भी शुरू हो गए। हालांकि किसानों ने इससे पहले 15 दिसंबर को धरना उठाने का निर्णय लिया था, मगर आपसी सहमति होने पर धरना पहले ही उठा लिया गया। धरना समाप्त होने से पूर्व किसानों ने फतेही जश्न मनाया। इस दौरान जिला कैथल के 10 और कुरुक्षेत्र के एक शहीद किसान के आश्रित परिवार को सम्मानित किया गया।
बता दें 24 दिसंबर 2020 को किसानों ने सैनी माजरा व थाना टोल प्लाजा को बंद करके धरना शुरू किया था। तब से लेकर किसान टोल प्लाजा पर ही डटे हुए थे। धरने के पहले दिन टोल प्लाजा पर भारी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था, मगर किसानों ने कोई परवाह न करते हुए दोनों टोल को बंद कर दिया था। थाना टोल प्लाजा पर जिला कैथल व कुरुक्षेत्र के किसान डटे हुए थे। किसानों का कहना है कि टोल प्लाजा पर डटे किसानों के बीच जात पात और धर्म का कोई बंधन नहीं था। सभी का सिर्फ एक किसानी ही धर्म और कर्म था। सभी सुख-दुख के साथी बन गए थे। वहीं उनका जगह से भी जुड़ाव हो गया था। बिछड़ने का गम तो जरूर है, मगर उससे ज्यादा जीत की खुशी भी है। हालांकि सभी व्हाट्सएप पर किसान यूनियन हरियाणा ग्रुप से जुड़े हुए हैं। वहीं सैनी माजरा टोल प्लाजा के प्रबंधक नरेंद्र कुमार ने बताया किसानों के हटने के बाद सोमवार दोपहर 2 बजे टोल प्लाजा को शुरू किया गया है। हालांकि अभी उन्होंने टोल टैक्स में कोई वृद्धि नहीं की है। पिछले महीने 24 नवंबर को ही उन्होंने से टोल का टेंडर लिया था। अब धीरे-धीरे व्यवस्था बन जाएगी।
बिछड़ने का दुख, मगर जीत की खुशी भी
टोल प्लाजा थाना पर धरना दे रहे किसान उत्तम सिंह ने बताया कि यहां सभी लोग एक परिवार की तरह रह रहे थे। यहां किसी भी किसान का कोई जाति और धर्म नहीं था, बल्कि सभी का एक ही किसानी धर्म और कर्म था। आंदोलन में जीत के साथ उन सबकी विदाई हुई। हालांकि दूर होने का गम जरूर था, मगर जीत की खुशी उसमें कहीं ज्यादा थी। यहां रोजाना जिला कुरुक्षेत्र व कैथल के 100 से ज्यादा किसान धरनारत थे।
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1947 जैसे संघर्ष के बाद मिली आजादी
जसमेर सिंह ने बताया कि इस आंदोलन ने सभी किसानों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। सभी एक दूसरे से अपने सुख व दुख बांटने लगे थे। आंदोलन के दौरान जब किसी किसान की शहादत होती थी तब कोई भी किसान खाना नहीं खाता था। उनकी यह जीत 1947 में मिली आजादी से कम नहीं है। इस संघर्ष में उन्होंने अपने 714 किसानों को खो दिया, मगर उनकी शहादत के बूते ही उनकी जीत हुई है। यह एक साल कैसे बीत गया उन्हें पता ही नहीं चला। वह रोजाना 26 किलोमीटर दूर धरने में शामिल होने जाते थे।
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26 जनवरी की घटना ने बदला आंदोलन का रंग
गांव क्वारतन (कैथल) के किसान बलजीत सिंह ने बताया कि आंदोलन के दौरान 26 जनवरी की घटना से उनको गहरा आघात लगा, जिसमें किसानों को बदनाम किया गया। उसके बाद वे थाना टोल प्लाजा पर धरने में शामिल हो गए थे। धरना खत्म होने के बाद भी आज भी टोल प्लाजा पर ही खड़े है। उन्होंने अपने किसान साथियों के साथ ही जीने-मरने का फैसला कर लिया था।