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शिक्षक दिवस पर विशेष...

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शिक्षक दिवस पर विशेष
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फोटो 1
एक शिक्षक ऐसा भी
सरकारी स्कूल में बिना वेतन जगा रहा शिक्षा की लौ
- 2007 की सेवानिवृत्ति होने के बाद पढ़ाने के साथ-साथ कार्यालय के कार्यों का भी 10 वर्षों से उठा रहे जिम्मा
सेवा सिंह
कुरुक्षेत्र। न कोई तनख्वाह, न कीमती कपड़े, न हाथ में स्मार्ट फोन और न ही आने-जाने के लिए कोई गाड़ी। बस है तो एक पुरानी साइकिल और बच्चों में ज्ञान की लौ जलाने का जुनून। यह पहचान है थानेसर खंड के गांव भूस्तला स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय मेें ज्ञान का प्रकाश फैला रहे जगदीश चंद्र गुप्ता की। उन्हें हर कोई गुरुजी के नाम से ही जानता है। आधुनिकता की दौड़ में शामिल हो चुके एवं वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हर रोज सड़कों पर उतरने वाले व अच्छे परिणाम देने में पिछड़ रहे शिक्षकों से लेकर शिक्षा के ढांचे व समाज को भी वे आईना दिखा रहे हैं।
इसी स्कूल में 14 जुलाई 1973 से हिंदी अध्यापक के रूप में पढ़ाते रहे एवं बेहद साधारण व्यक्तित्व वाले जगदीश चंद्र गुप्ता भले ही विभाग के रिकार्ड के अनुसार यहीं से 31 दिसंबर 2007 को सेवानिवृत्त हो गए हो, लेकिन अपने दिल से वे आज भी पहले की तरह ही तैनात है। वह भी बिना एक पैसा लिए आज तक लगातार बच्चों को पढ़ा रहे हैं। न उनका जुनून कम हुआ और न ही स्कूल, शिक्षा व बच्चों से मोह कम हो पाया है। भले ही अब तीसरी पीढ़ी में वे ज्ञान फैलाने का कार्य कर रहे हो, लेकिन सेवानिवृत्ति से पहले से लेकर आज तक न कभी स्कूल में समय से लेट पहुंचे और न ही कभी फरलो मारने का ही प्रयास किया। मूल रूप से अजराना कलां निवासी जगदीश गुप्ता आज भी इस स्कूल के लिए स्तंभ बने हुए हैं, जो बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ स्कूल की हर कागजी कार्रवाई को भी अपटूडेट संभाले हुए हैं। उनकी कार्यशैली व समर्पण भावना के चलते प्रिंसिपल वीरेंद्र गर्ग से लेकर पूरे स्टाफ का सिर गर्व से ऊंचा उठा हुआ है तो वहीं उनकी बदौलत आज तक स्कूल पर किसी पत्र व्यहार व रिकार्ड को लेकर लेटलतीफी का विभाग की ओर से दाग नहीं लगा है।
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प्रिंसिपल वीरेंद्र गर्ग का कहना है कि स्कूल का पूरा रिकार्ड उनके टिप्स पर है तो वहीं वे एक मिनट का समय भी बच्चों को शिक्षित करने व स्कूल को संभाले जाने में लगाना उचित समझते हैं। अमर उजाला के साथ बातचीत मेें जगदीश चंद्र गुप्ता का कहना है कि वे सिर्फ बच्चों को बेहतर शिक्षा देकर एक अच्छे समाज का निर्माण चाहते हैं। इसके चलते ही वे अपने सेवाकाल से लेकर बाद में आज तक कभी भी पढ़ाने व स्कूल के दूसरे कार्यों से पीछे नहीं हटे हैं। उनका कहना है कि सेवानिवृत्ति के बाद पैसे का भी उन्हें कोई लालच नहीं बल्कि स्कूल में आने-जाने व अपने ऊपर यहां होने वाला खर्च भी स्वयं ही उठाते हैं। उनकी सोच है कि उनके समय देने व एक पैसा भी खर्च करने से बच्चों की पढ़ाई होती है तो यही सबसे बड़ी कमाई होगी। वे हर रोज अपने गांव से साइकिल पर ही स्कूल पहुंचते हैं जबकि उन्होंने न आज तक कोई मोबाइल व बाइक ही ली है और न ही वे स्कूल में शिक्षकों के हाथों में मोबाइल को पसंद करते हैं।

सेवानिवृत्त हुए तो आज तक रिक्त पड़ा पद
जगदीश चंद्र गुप्ता 31 दिसंबर 2007 को हिंदी अध्यापक के तौर पर सेवानिवृत्त हुए तो इससे पहले भी वर्ष 1973 से वे ही हिंदी पढ़ा रहे थे। इससे पहले वे ढांड के समीप गांव जाजनपुर में पढ़ा रहे थे, जहां से 7 जुलाई को स्थायी होने के बाद गांव भूस्तला के स्कूल में आए। यहां उनके सेवानिवृत्त होने के बाद शिक्षा विभाग आज तक यह पद नहीं भर पाया है, लेकिन उन्होंने यह पद रिक्त होने का आभास बच्चों से लेकर स्टाफ को भी नहीं होने दिया। यहां तक कि स्कूल में करीब 15 वर्षों से रिक्त पड़े क्लर्क के पद की जिम्मेदारी भी वे ही आज तक उठा रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने सेवानिवृत्त के बाद एक भी पैसा स्कूल से नहीं लिया।
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जब गांव के सरपंच ने पहनाई सोने की अंगूठी
जगदीश चंद्र गुप्ता बच्चों से लेकर ग्रामीणों में कितना सम्मान हासिल कर चुके थे, इसका अंदाजा इसी से ही लगाया जा सकता है कि सेवानिवृत्ति के समय गांव के तत्कालीन सरपंच ओमवती के पति देवेंद्र ने उन्हें सोने की अंगूठी पहनाई थी। पूरा गांव ही नहीं आसपास के लोग भी उन्हें गुरुजी कहकर पुकारते हैं। प्रिंसिपल वीरेंद्र गर्ग के अनुसार गांव की तीन-तीन पीढ़ियां उनके पांव छूती है। वे शिक्षा देने में इतने संपूर्ण है कि गांव के छोटी सी किराना की दुकान को भी उनकी पत्नी संभाल रही है।
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गुरु से मिली प्रेरणा को बना लिया जीवन
जगदीश चंद्र गुप्ता का कहना है कि हीरालाल खंडूजा उनके अंग्रेजी पढ़ाने वाले गुरु थे, जो उस समय स्कूल के मुख्याध्यापक भी थे। उन्होंने अपने विचारों व जीवन से जो प्रेरणा दी उसे ही हमने भी अपना जीवन बना लिया। छात्र जीवन में भी वे कभी भी न स्कूल जाने से रुके और न कभी स्कूल में लेट पहुंचे। यही रूटीन ड्यूटी के दौरान और अब तक का रहा है।
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