फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

संरक्षित खेती पर प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू

विज्ञापन
विज्ञापन
करनाल। अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र (सिमिट), बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (बीसा) व केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल के तत्वावधान में सोमवार को 11वां संरक्षित कृषि आधारित आधुनिक प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। ‘गेटवे फॉर प्रोडक्टिव एंड सस्टेनेबल क्रॉपिंग सिस्टम’ विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने कृषि खाद्य सुरक्षा पर जोर दिया। कहा कि संरक्षित खेती से उपज को बढ़ाया जा सकता है।
विज्ञापन

मुख्य अतिथि महाराणा प्रताप उद्यानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. समर सिंह ने कहा कि कृषि क्षेत्र खाद्य सुरक्षा का मुख्य आधार है। कृषि खाद्य सुरक्षा द्वारा ही मनुष्यों के जीवन स्तर में बदलाव लाया जा सकता है। 90वें दशक में खाद्य उत्पादन अब की तुलना में काफी कम था लेकिन कृषि क्षेत्र में हुए विकास द्वारा इसको बढ़ाया जा रहा है। साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के होने वाले नुकसानों को भी कम किया जा रहा है। इसमें स्मार्ट कृषि का मुख्य योगदान है। संरक्षित खेती द्वारा पिछले दो दशकों से शून्य जुताई पद्धति के द्वारा गेहूं में मंडूसी से होने वाले नुकसान को काफी कम किया गया है। शून्य जुताई के साथ फसल अवशेष प्रबंधन द्वारा ही हम मंडूसी जैसी खरपतवारों को कम कर सकते हैं तथा पानी व मजदूरी की भी बचत कर सकते हैं।
विशिष्ट अतिथि एवं संस्थान के निदेशक डा. प्रबोध चंद्र शर्मा ने कहा कि संरक्षित खेती एक प्रकार की बहुआयामी पहल है जिसके द्वारा हम अपनी उपज को बढ़ा सकते हैं। धान-गेहूं की फसल हमारे गंगा मैदानी क्षेत्र की मुख्य फसलें हैं लेकिन अधिक खाद-पानी के कारण फसल उत्पादकता में काफी कमी आ गई है। भारत में 6.23 मिलियन हेक्टर लवणग्रस्त मृदाएं हैं जो निरंतर बढ़ती जा रही हैं। जिसके कारण मृदा स्वास्थ्य में गिरावट, फसल उत्पादकता में कमी, भू-जल का खराब होना व मौसम में बदलाव मुख्य कारण है। इन कारणों को संरक्षित खेती को अपनाकर ही कम किया जा सकता है जिसमें शून्य जुताई, फसल क्र, फसल अवशेष प्रबंधन व फसल विविधीकरण मुख्य सिद्धांत हैं। हम 2009 से सिमिट के साथ मिलकर इस पर कार्य कर रहे हैं साथ ही किसानों को इन विधियों के बारे में प्रशिक्षण दे रहे हैं। घटते भूजल को ध्यान में रखते हुए हम उपसतही ड्रिप सिंचाई के द्वारा जल का कम उपयोग व फसल की उपज को बढ़ाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। जिसकी वजह से किसानों को काफी लाभ मिल रहा है। हमारी फसल का मुख्य स्त्रोत, मृदा कार्बनिक पदार्थ है जो दस वर्ष पहले 0.4 से 0.5 प्रतिशत था लेकिन अब संरक्षित खेती के बाद यह 0.9 व उससे अधिक हो गया है। जिसके कारण मृदा के भौतिक व रासायनिक कारकों में काफी वृद्धि आ गई है। जिससे 20 प्रतिशत नाइट्रोजन व पानी की बचत कर रहे हैं साथ ही फसल के दानों में प्रोटीन की गुणवत्ता में बढ़ोतरी हो रही है।
विज्ञापन

प्रधान वैज्ञानिक डा. एमएल जाट ने कहा कि संरक्षित खेती पर हम काफी वर्षों से काम कर रहे हैं साथ ही महिलाओं को संरक्षित खेती के बारे में प्रशिक्षण देना हमारा मुख्य उद्देश्य है। इस प्रशिक्षण की शुरूआत 2010 में पीएयू, बीसा व सीएसएसआरआई के साथ मिलकर की। प्रशिक्षण कार्यक्रम में हैप्पी सीडर, लेजर लैंड लेवलर, टू-वहील ट्रैक्टर के बारे में प्रशिक्षण दिया। अभी तक हमने संरक्षित खेती पर अंतरराष्ट्रीय देशों जैसे चीन, इरान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भारत के साथ मिलकर इस प्रशिक्षण के द्वारा संरक्षित खेती की तकनीकों को बढ़ाया है। इस मौके पर प्रधान वैज्ञानिक डा. एचएस जाट और डा. दीपक मौजूद रहे। प्रशिक्षण कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि विज्ञान केंद्र, अनुसंधान संस्थान, अनुसंधान परियोजनाएं व कृषि विश्वविद्यालयों के कुल 16 वैज्ञानिक, विषय विशेषज्ञ, सहायक प्रोफेसर व विद्यार्थी भाग ले रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें