करनाल। गेहूं बिजाई का कार्य अंतिम चरण में है। इस दौरान प्राय: बीज की गुणवत्ता को लेकर किसानों के मन में संशय बना रहता है। कुछ किसान आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर खर्च बचाने के प्रयास में घर में रखे गेहूं की बिजाई करते हैं। यही मुख्य वजह है कि साल दर साल प्रमाणित बीज का शत-प्रतिशत विस्थापन नहीं होता। विशेषज्ञों का कहना है कि किसान स्वयं भी अच्छी गुणवत्ता का बीज तैयार कर सकते हैं। बशर्ते उन्हें गेहूं बिजाई से कटाई तक की तमाम प्रक्रियाओं के बीच विशेष ध्यान रखना होगा।
भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनुज कुमार ने कहा कि यह बीज पर निर्धारित करता है कि फसल की कितनी पैदावार होगी। बीज की गुणवत्ता उसकी अंकुरण क्षमता व आनुवंशिक शुद्धता पर निर्धारित करती है। यह अलग-अलग श्रेणी का बीज होता है। जिसमें नाभकीय बीज, प्रजनक बीज, आधार बीज तथा प्रमाणित या विश्वसनीय बीज शामिल हैं। यदि किसान स्वयं गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करते हैं तो समय पर बिजाई जरूरी है। बीज को उपचारित करें। समय पर उचित मात्रा में खाद-पानी का प्रयोग करें। उसके बाद जब बालियां आने की अवस्था हो तो उस समय कवकनाशी का स्प्रे अवश्य करना होता है।
उन्होंने बताया कि कटाई करते समय खेत की मेड़ों से पांच मीटर तक गेहूं का अलग बंडल बनाकर रखना है। बाकी खेत के सारे गेहूं को अलग बंडल बनाकर थ्रेसिंग करनी है। उस बीज को तब तक सुखाना है जब तक कि नमी की मात्रा 10 से 12 प्रतिशत रह जाए। फिर उसमें कीटनाशक दवा का प्रयोग करके भंडारण करें। अगले वर्ष अक्तूबर में जब बिजाई करनी हो तो बीज को निकालें और इसमें झरना अवश्य लगवाएं। यह प्रक्रिया भंडारण से पूर्व भी कर सकते हैं। इससे कटे-टूटे दाने, कंकर-पत्थर व खरपतवार के बीज अलग हो जाते हैं। एक समान दाने हमें मिल जाते हैं। यही प्रक्रिया हम तीन से चार वर्ष तक दोहरा सकते हैं। गेहूं का बीज बार-बार खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
प्रजाति विस्थापन के समय ही आती है समस्या
डॉ. अनुज कुमार ने बताया कि देश में 40 से 50 प्रतिशत गेहूं के बीज की विस्थापन दर है। इस विषय के दो पहलू हैं, एक बीज का विस्थापन व दूसरा प्रजाति का विस्थापन। जो प्रचलित किस्में चल रही हैं उन्हीं का नया प्रमाणित बीज लेकर लगाएं तो कोई दिक्कत नहीं आती। बहुत सी निजी व सरकारी संस्थाएं ऐसी किस्मों का बीजोत्पादन करती हैं। दूसरी ओर प्रजाति के विस्थापन में पुरानी प्रजाति को नई प्रजाति के बीज से विस्थापन के समय ही समस्या आती है। जब कोई नई किस्म रिलीज होती है तो उसे सीड चेन में आने में चार-पांच साल लग जाते हैं।