भारत कोकिला सरोजनी नायडू के जन्मदिवस पर रविवार को राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। इस अवसर पर शहर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। जिसमें महिलाओं को अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी दी गई। कुछ महत्वपूर्ण पदों को संभाल रहीं महिलाओं का कहना था कि पिछड़ेपन के लिए महिलाएं भी खुद कम जिम्मेदार नहीं हैं, क्योंकि अधिकांश महिलाएं विशेष पदों पर बैठे होने के बावजूद पुरुषों के दिशा-निर्देशन में ही काम करतीं हैं। इसके अलावा सामाजिक सोच में भी बदलाव जरूरी है।
क्याें मनाया जाता हैं राष्ट्रीय महिला दिवस
यूं तो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को मनाया जाता है लेकिन 2014 में भारतीय महिला संघ व अखिल भारतीय महिला सम्मेलन के दौरान सरोजनी नायडू की 135वीं जयंती पर 13 फरवरी को उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान के साथ ही महिलाओं के अधिकारों को लेकर संघर्ष किया था, इसलिए उन्हें नाइटेंगल ऑफ इंडिया, भारत कोकिला के रूप में पहचान मिली। सरोजिनी नायडू देश की पहली महिला राज्यपाल भी बनी थीं। 2 मार्च 1949 को उनका देहांत हो गया था।
खुद संभालनी होगी जिम्मेदारी
जिला युवा अधिकारी रेनू सिलग ने बताया कि सरकार की ओर से महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में कई तरह के कदम उठाए जा रहे हैं पर हालात उतनी तेजी से बदलते नहीं दिख रहें। राजनीतिक दृष्टिकोण से बात करें तो पंचायत चुनाव में आरक्षण मिलने के बाद भी अधिकतर महिला पंचायत अध्यक्ष पद से लेकर अन्य राजनीतिक पदों पर बैठने के बाद भी पति के दिशा निर्देशन में ही काम करतीं हैं। ऐसे में मेरा यही मानना है कि इसमें महिलाओं का भी दोष है। हालांकि महिलाओं की आने वाली पीढ़ी महिला सशक्तिकरण की अवधारणा को जरूर साकार करेगी।
योजनाओं से नहीं चलेगा काम
अधिवक्ता संगीता वर्मा ने बताया कि हमारे देश में कई वर्षों से राष्ट्रीय महिला दिवस, महिला दिवस, बालिका दिवस जैसे कई दिवस हर वर्ष मनाए जाते हैं। सरकारें भी अपनी ओर से महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई योजनाएं बनाती हैं लेकिन ये योजनाएं कागजों में तो अच्छी लगती हैं पर धरातल पर स्थिति कुछ और ही है। मेरा मानना है कि अभी भी महिलाओं के इस पिछडे़पन के पीछे महिलाएं खुद भी जिम्मेदार हैं। जब दोनों बराबर की कमाई और काम करते हैं तो घर के काम में भी दोनों को बराबर का ही काम करना चाहिए। सरकारें कितनी भी योजनाएं ले आएं जब तक समाज की सोच में बदलाव नहीं आता इस प्रकार के दिवस मनाने का कोई फायदा नहीं होगा।