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Karnal: पेपर, प्लाईवुड, हाईड्रोजन गैस प्लांट के लिए गन्ना होगा वरदान साबित, इन प्रजातियों पर शोध कार्य शुरू

Thu, 24 Aug 2023 12:29 PM IST
नवीन दलाल देव शर्मा, करनाल (हरियाणा)

सार

गन्ना प्रजनन संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र करनाल में अब ऐसी प्रजातियों पर लगातार शोध चल रहा है, जिन्हें एनर्जी केन कहा जाता है। ऐसी किस्मों में चीनी रिकवरी भले ही कम हो, लेकिन बॉयोमॉस (बैगास आदि) अत्यधिक होता है। 
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गन्ने की अधिक बायोमास वाली प्रजातियां - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गन्ने से चीनी के साथ-साथ इथेनॉल, शीरा, शराब आदि तो बनता ही है, साथ ही बिजली उत्पादन, पेपर और गत्ता उत्पादन. प्लाईबोर्ड, बॉयोरिफाइनरी और ईकोफ्रेंडली वेयर बनने लगे हैं। अब बिजली उत्पादन, पेपर उद्योग, प्लाईवुड, हाईड्रोजन गैस प्लांट में भी ये गन्ना काम आएगा। वहीं, ऐसी थाली, कटोरी, प्लेट और चम्मचों का निर्माण भी होगा, जिन्हें भोजन करने के बाद खाया जा सकेगा। गन्ने की औद्योगिक उपयोगिता को देखते हुए देश के वैज्ञानिकों ने गन्ने की ऐसी प्रजातियों पर भी अनुसंधान शुरू कर दिया है, जिन्हें एनर्जी केन कहा जाता है। इसे लेकर गन्ना प्रजनन संस्थान में कई तरह के शोध कार्य चल रहे हैं। जिसमें करनाल व कोयंबटूर के वैज्ञानिक जुटे हैं।

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देश में पेट्रोल की जरूरत लगातार बढ़ रही
किसानों द्वारा खेतों में पैदा किए जाने वाला गन्ना अब सिर्फ गुड़, शीरा या चीनी ही नहीं बनाता, इससे सामान्य जीवन में उपयोग होने वाली विभिन्न वस्तुओं का निर्माण किया जाने लगा है। देश में पेट्रोल की जरूरत लगातार बढ़ रही है, जिसमें केंद्र सरकार अब इथेनॉल मिलाने लगी है, जिसकी मात्रा अब और बढ़ाने वाली है। जो गन्ने के शीरे से बनाया जाता है।

करनाल क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र पर भी शोध कार्य चल रहा
इथेनाॅल गन्ने की उन्हीं प्रजातियों से अधिक बनता है, जो अधिक चीनी वाली होती हैं, इसके लिए सीओ-0238, सीओ-0118 आदि कई प्रजातियां हैं। गन्ना प्रजनन संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र करनाल के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसके पांडेय ने बताया कि अब ऐसी प्रजातियों पर भी लगातार शोध चल रहा है, जिन्हें एनर्जी केन कहा जाता है, क्योंकि ऐसी किस्मों में चीनी रिकवरी भले ही कम हो, लेकिन बॉयोमॉस (बैगास आदि) अत्यधिक होता है। ऐसी कुछ किस्मों पर करनाल क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र पर भी शोध कार्य चल रहा है।

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पेपर उद्योग और प्लाईवुड उद्योग के लिए वरदान

इसका बड़ा फायदा ये होगा कि गन्ने की ये किस्में बिजली उत्पादन में तो महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी ही, साथ ही पेपर उद्योग और प्लाईवुड उद्योग के लिए वरदान साबित होगी। डॉ. एसके पांडेय ने बताया कि गन्ने के बैगास आदि से पेपर बनने लगा है। इससे उच्च गुणवत्ता वाले प्लाईवुड बोर्ड आदि का निर्माण होगा। इसका सीधा उपयोग बॉयोरिफाइनरी में होगा और हाईड्रोजन गैस उत्पादन में भी किया जाएगा।

भोजन के बाद थाली, प्लेट, चम्मच को भी खा सकेंगे
जिस थाली, प्लेट, कटोरी और चम्मच से हम लोग भोजन करते हैं, आने वाले दिनों में भोजन के बाद उन थाली, प्लेट, चम्मच आदि को भी खा लिया जाएगा। यूं तो ये तकनीक पहले ही विकसित की जा चुकी हैं, कुछ संस्थानों, कंपनियों ने गेहूं के भूसे आदि से ऐसे खाद्य बर्तन बनाए हैं, लेकिन अब ऐसे बर्तनों को गन्ने के बैगास आदि से बनाने की तकनीक पर गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर व करनाल ने काम शुरू कर दिया है। इसके लिए गन्ना प्रजनन संस्थान कोयंबटूर, दोगावरी इंडस्ट्री कर्नाटक, करूर में तमिलनाडु पेपर मिल, केपीआईटी टेक्नोलॉजी पुणे (महाराष्ट्र) आदि के सहयोग से इस तकनीक पर शोध कार्य किया जा रहा है। इसके बाद ही गन्ने से जैम, जैली, आइसक्रीम, सीरप आदि भी अधिक मात्रा में बनेंगे।
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अधिकारी के अनुसार

गन्ने को औद्योगिक बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका फायदा उद्योगों को तो होगा ही, साथ ही इसका सबसे बड़ा फायदा किसानों को भी होगा, क्योंकि जितना अधिक गन्ने का उपयोग बढ़ेगा, उतनी ही गन्ने की मांग भी बढ़ेगी। इसके लिए किसानों को अधिक गन्ना पैदा करना होगा, किसानों को गन्ने की कीमत भी अच्छी मिलेगी। जिससे किसानों की आय में भी इजाफा होगा। ये शोध मानवीय स्वभाव में बदलाव का साक्षी तो होगा ही, साथ ही पौष्टिक भी होगा, क्योंकि इससे खाने वाले के शरीर में फाइबर की पूर्ति होगी। गन्ना प्रजनन संस्थान ने गन्ने से निर्मित बिस्कुट को तैयार कर लिया है। - डॉ. एसके पांडेय, वरिष्ठ वैज्ञानिक, क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, गन्ना प्रजनन संस्थान करनाल।
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