- साझा साहित्य मंच की बैठक में साहित्यकारों ने रचनाएं पेश कर लूटी वाहवाही
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। साझा साहित्य मंच की बैठक सेक्टर-12 स्थित कार्यालय में की गई जिसमें विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर कविता पाठ कर कवियों ने अपनी-अपनी बात रखी। दलीप खरेरा ने कहा-महक रहे चमन-चमन बरस धरा पे रहा गगन, करते हैं हम अभिनंदन, करते हैं हम अभिनंदन। नरेश लाभ ने एक प्रेमिका के मन के भाव को बादलों का मानवीकरण कर इस अंदाज में प्रकट किया- ‘झूम-झूम कर बरसो मेघा, सावन में इस बार, प्रियतम मेरे घर आए हैं, करने मुझसे प्यार। किशोर कमल बोले ‘मसान में खाता, मसान में पीता, मसान में करना कारोबार, आगाज ओ अंत, सबकुछ मसान में, मसान को ही करता दरकिनार’।
कवि कृष्ण कुमार निर्माण ने कहा- ‘उसे था सिर्फ अपने से मतलब और मुझे था सिर्फ उससे मतलब, थे तो दोनों ही मतलबी, मगर मैं तड़पता रहा वह चैन फरमाता रहा’। डाॅ. कमर रईस ने अपनों से मिले जख्म दिखाए ‘जब भी अपनों को आजमाता हूं, जख्म कोई जरूर खाता हूं’। रोजलीन ने कुछ इस अंदाज में अपने मन के भाव प्रकट किए ‘दीया जग रहा है अंबर पीला हो गया, एक रंग एक उजाला उमड़ आया धरती पर, भासित आहलाद जाटिका टीसते हृदय पर’।
दीपक वोहरा बोले ‘यही समय सही समय है जब हम कुछ कर सकते हैं, मसलन अपने हक की बात कर सकते हैं’। प्रवीन जोरिया ने दुनिया की हकीकत बताई-‘यहां कोई भूखा दौलत का, यहां कोई प्यासा शोहरत का’। लाभ सिंह आर्य ने रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां पढ़ते हुए कहा ‘जला अस्थियां बारी-बारी, चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गए पुण्य बेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल, कलम आज उनकी जय बोल’।
जगदीश मदान ने आज के दौर पर कटाक्ष करते हुए कहा- ‘जमाने में आए हो तो जीने का हुनर रखना, दुश्मनों से कोई खतरा नहीं, बस अपनों पर नजर रखना’। जय भारद्वाज बोले ‘क्या नाम दें उसको अभी ये तय नहीं, मासूम दिखता है मगर वो है नहीं’। सुषमा चोपड़ा ने फरमाया ‘रिमझिम-रिमझिम सावन आया, बरसे घटा घनघोर, के मनवा नाचे जैसे मोर, के मनवा नाचे जैसे मोर’। बैठक की अध्यक्षता दीपक वोहरा व संचालन कृष्ण कुमार निर्माण ने किया। मुख्य अतिथि दलीप खरैरा व विशिष्ट अतिथि डाॅ. कमर रईस रहे।