माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। अब पहले जैसी बहार तो नहीं रही पर लोहड़ी का उत्साह बरकरार है। पहले लोहड़ी या अन्य त्योहार सामूहिक रूप से मनाए जाते थे। 20 दिन पहले ही त्योहारों की रौनक नजर आने लगती थी। गली-मोहल्लों में मिलकर मनाया जाने वाला लोहड़ी पर्व अब केवल घर आंगन तक सिमट कर रह गया है।
बीते समय को याद करते करते हुए बुजुर्गों का कहना है कि पहले गली में आग जलाने के बाद ढोल और गीत गाकर लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता था। लेकिन अब ढोल और गीतों की जगह डीजे ने ले ली है। खुले में लोहड़ी सजने के बजाय घर के आंगन या होटलों में आयोजन होने लगे हैं। आधुनिकता की चकाचौंध और महंगाई की मार भी त्योहारों को फीका कर रही है। वहीं पिछले दो साल से कोरोना के कारण भी त्योहार सिमटते नजर आ रहे हैं। इस लोहड़ी पर पढ़ें अमर उजाला की खास प्रस्तुति...
निमंत्रण की जरूरत नहीं थी, लोग खुद आते थे
लोहड़ी पर्व में पहले सादापन था लेकिन अब औपचारिकता ज्यादा रह गई है। गलियों में सामूहिक आयोजन होने बंद हो गए हैं। एक समय था जब लोहड़ी के दिन गली या आसपास में कहीं आग जलती दिखाई देती थी तो लोग खुद पहुंच जाते थे। त्योहार की खुशी मिलकर मनाई जाती थी, लेकिन आज लोग पड़ोसी को भी नहीं बुलाते। घर के दरवाजे के आगे अग्नि जलाकर अकेले त्योहार मनाते दिखाई देते हैं। इसी तरह पड़ोसी भी तब तक नहीं जाते जब तक बुलावा न आए। यही बर्ताव त्योहारों की मिठास कम कर रहा है।
- डॉ. रामजी लाल, पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज
विधिवत पूजन न होकर प्रायोजित कार्यक्रम बना दिया
लोहड़ी की बात करें तो शीतकाल में सूर्य की उष्णता कम हो जाती है। अग्निदेव ही हमें उष्णता प्रदान करते है लेकिन अब आधुनिकता ने त्योहारों के वास्तविक अर्थ बदल दिए हैं। लोहड़ी पर नए जोड़े या जिस बच्चे की पहली लोहड़ी होती थी, उसे अग्निदेव की परिक्रमा कराई जाती थी। ईश्वर को प्रसन्न करके आशीर्वाद पाना मकसद होता था। अब विधिवत पूजा न करके प्रायोजित कार्यक्रम बन गए हैं।
- डॉ. प्रवीण भारद्वाज, शिक्षाविद एवं पूर्व प्रिंसिपल, राजकीय पीजी कॉलेज
15 दिन पहले ही लोहड़ी मांगना शुरू कर देते थे बच्चे
लोहड़ी के 15 दिन पहले से ही गीत गाते हुए बच्चे लोहड़ी मांगना शुरू कर देते थे। यही इस त्योहार का खुमार था। उस समय लोग बच्चों को पैसे देने या खाने का सामान देने से इनकार नहीं करते थे। बच्चे भी खूब मस्ती करते थे। अब लोहड़ी के दिन भी कोई गीत गाता नजर नहीं आता। यदि बच्चों को बुलाकर भी कुछ देना चाहे तो लोग अपमान समझते हैं। आधुनिकता ने इस त्योहार के आनंद को छीन लिया।
- शीलावंती, सदर बाजार
पहले थोड़े खर्च में ही मनाया जाता था यह पर्व
लोहड़ी पंजाबियों का विशेष त्योहार है, जिसे धूमधाम से मनाते हैं। नाच, गाना और ढोल तो पंजाबियों की शान है। इसके बिना त्योहार अधूरे हैं। करीब 30 साल पहले थोड़ से खर्च में ही यह त्योहार मनाया जाता था लेकिन अब महंगाई ने इसके खुमार को कम किया है। बड़े आयोजन में खर्च भी ज्यादा आता है। हमारे परिवार में लोहड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। गली मोहल्ले के लोग भी एकत्रित होते हैं लेकिन पहले जैसा जश्न अब देखने को नहीं मिलता। केवल औपचारिकताएं ही रह गई हैं।
-अशोक कुमार चुघ, हांसी रोड
पहली लोहड़ी का क्रेज
नाचते हुए लेंगे अग्नि के फेरे, मनाएंगे खुशी
कोरोना के कारण लोहड़ी पर बड़ा आयोजन नहीं करेंगे। परिवार के सदस्य और कुछ रिश्तेदार ही शामिल होंगे। दोनों पति-पत्नी नाचते हुए अग्नि के फेरे लेंगे और खुशी मनाएंगे। लोहड़ी पर्व का सालभर इंतजार रहता है। परिवार ने त्योहार मनाने की तैयारी कर रखी है। ढोल और डीजे भी बुक कर लिया है।
रवनीत सिंह और सिमरत कौर, प्रेम नगर
बेटी की पहली लोहड़ी पर होगा जश्न
इस बार बेटी टियांशी की पहली लोहड़ी है। परिवार में लोहड़ी पर्व को लेकर काफी उत्साह है। तैयारी पूरी कर ली हैं। अग्निदेव की परिक्रमा करके परिवार की खुशहाली की कामना करेंगे। शाम को सभी एक साथ खाना खाएंगे। ढोल पर नाचकर खुशी मनाएंगे।
- जय ढींगड़ा और गुंजन, सेक्टर-6