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किसान आंदोलन में गंवाई जान, पूरी हुई मांग, परिजन खाली हाथ

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विनोद कुमार सिंह
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करनाल। किसान आंदोलन में जीटी बेल्ट के जिलों से कई किसानों ने जान गंवाई है। लंबे आंदोलन के बाद अब किसानों की मांग भी पूरी हो गई है, लेकिन इसमें जान गंवाने वाले किसानों के परिजन आज भी खाली हाथ है। उनका कहना है कि कृषि कानून वापसी को लेकर खुशी है कि किसानों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, लेकिन अपनों के खोने का गम कभी कम नहीं हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की सुबह जैसे ही तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की तो किसानों के साथ ही विपक्षी राजनीतिक दलों के चेहरे खिल उठे। किसानों ने जहां एक ओर मिठाइयां बांटकर और एक दूसरे को बधाई देकर खुशी का इजहार किया। वहीं राजनीतिक दलों ने इसे ‘अभिमान पर किसान की जीत’ करार दिया। लेकिन पूरे आंदोलन में जिसने अपनों को खोया है, उसके हाथ जीत के बाद भी खाली हैं। जीटी बेल्ट के कैथल जिले से ही आंदोलन के दौरान 10 किसानों की मौत हो चुकी है। वहीं करनाल के सात किसानों की आंदोलन के दौरान मौत हुई है। इसमें दिल्ली बार्डर पर करनाल के संत बाबा राम सिंह द्वारा खुद को खोली मारने की घटना ने सभी को झकझोर दिया था। इसके अलावा करनाल में लाठीचार्ज के दौरान जख्मी हुए एक किसान सुशील काजल की मौत ने आंदोलन में नई जान फूंक दी थी। पानीपत और कुरुक्षेत्र के एक-एक किसान की भी आंदोलन के दौरान मौत हो गई। इस दौरान अंबाला से भले ही किसी किसान की जान नहीं गई, लेकिन आंदोलन में जिले का बड़ा योगदान रहा। अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि कानून को वापस लेने की घोषणा की है तो हर तरफ खुली का माहौल है, लेकिन जिन्होंने आंदोलन में अपनों को खोया है, उनके जख्म एकबार फिर हरे हो गए हैं।
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परिजनों को खोने का गम, कभी नहीं होगा कम
किसान आंदोलन में काल का ग्रास बनें सेरहधा के अमरपाल के परिवार से अमरजीत ने कहा कि परिवार को अभी तक कोई सहायता सरकार से नहीं मिली है। सरकार को चाहिए कि ऐसे परिवारों की मदद करे, जिनके परिवार से किसान शहीद हुए हैं। इन परिवारों में रोजगार का साधन नहीं बचा है।
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किठाना गांव से किसान आंदोलन में काल का ग्रास बनें ठंडिया राम के पौत्र प्रदीप कुमार ने कहा कि भले ही आंदोलन से उनके हाथ कुछ नहीं लगा, लेकिन संतोष है कि सरकार ने किसानों की बात सुनीं है। अन्यथा और भी किसान शहीद होते। उन्होंने कहा कि जिन्होंने भी आंदोलन के दौरान अपनों को खोया है, उनके परिजनों का गम कोई कम नहीं कर सकता है। खुशी है कि किसानों का आंदोलन और बलिदान व्यर्थ नहीं गया, इस बात का उन्हें गर्व है।
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