कुछ दिन पहले ही बनारसी लाल चावला ने बताया था कि जब कल्पना अमेरिका में थी तो वह उसके पास गए थे। एक दिन उसे कॉलेज से लौटने में काफी देर हो गई। जब वह कमरे पर पहुंची तो उन्होंने पूछा कि इतनी देरी क्यों हो गई। कल्पना ने कहा कि पिता जी जूता फट गया था, इसे सिलवाने में देर हो गई। उसकी सिलाई के लिए दिए गए रुपये सुनकर वह बोले कि इतने पैसे में तो जूते नए आ जाते, तो कल्पना का जवाब सुनकर वह चौक गए। उसने कहा कि पिता जी सुना है कि जूते चमड़े से बनाए जाते हैं, चमड़ा पशुओं को काटकर निकाला जाता है। नए जूते खरीदने का मतलब है, एक पशु का वध। यही सोचकर फटा जूता सिलवा लिया।
उनके करीबी प्रितपाल सिंह पन्नू ने बताया कि बनारसी लाल चावला, को कई विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में लेक्चर के लिए बुलाया जाता था। वह जाते थे तो अपने साथ कल्पना चावला पर विभिन्न चैनलों, संस्थाओं द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेंट्री, प्रोग्राम आदि की सीडी बनवाकर ले जाते थे। वहां विद्यार्थियों को निशुल्क बांटते थे, ताकि उन्हें प्रेरणा मिल सके। खास बात ये भी है कि वह किसी भी कार्यक्रम में बुके या स्मृति चिह्न नहीं लेते थे, उनका कहना था कि ये पैसे बच्चों की शिक्षा पर खर्च होने चाहिए।
बनारसी लाल चावला, समय के बेहद पाबंद थे, किसी भी कार्यक्रम में वह समय पर पहुंचते थे, आयोजकों से कहते थे कार्यक्रम समय पर ही शुरू और खत्म होना चाहिए। जो समय की कीमत नहीं समझते, समय उनकी कद्र नहीं करता। वह बालिका शिक्षा को लेकर काफी गंभीर थे। उन्होंने इसके लिए हमेशा प्रयास किए।