अमर उजाला ब्यूरो
शहर की मेयर यानि प्रथम नागरिक कौन बनेगी? इस बार यह फैसला पार्षद नहीं शहर के करीब ढाई लाख वोटर करेंगे। चूंकि 2019 की शुरुआत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव संभावित हैं। ऐसे में यह चुनाव काफी अहम माना जा रहा है।
पार्टियों की साख इस पर टिकी है। इसलिए कोई भी पार्टी इस चुनाव को हल्के में नहीं लेगी और मजबूत दावेदार पर दांव खेलेगी। जैसे-जैसे मौसम सर्द हो रहा है, वैसे वैसे ही शहर का सियासी पारा भी चढ़ता जा रहा है। मेयर पद के भावी दावेदार वार्ड-वार्ड चक्कर लगाने लगे हैं और अपना माहौल बना रहे हैं।
इधर, शहर के नागरिक भी इसमें विधानसभा इलेक्शन से अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। मेयर की कुर्सी चाहिए तो जाहिर सी बात है कि सभी 20 वार्डों में बड़ा वोट बैंक चाहिए। मतदाता तय करेंगे कि शहर का ताज किसने सौंपना है। जनता के जहन में कुछ सवाल हैैं। पहला कि भाजपा, कांग्रेस और इनेलो सहित अन्य राजनीतिक पार्टियां किन दिग्गजों पर दांव खेलेंगी? दूसरा, कौन-कौन से वह चेहरे रहेंगे जो आजाद उम्मीदवार के तौर पर उतरेंगे? स्थिति फिलहाल स्पष्ट नहीं है। पार्टियों ने भी अभी अपने पत्ते नहीं खोले, लेकिन राजनीति के गलियारों में सुगबुगाहट जरूर तेज हो गई है। राजनीतिक पार्टियां मंथन कर रही हैं। वोटरों की भी नब्ज टटोली जा रही है। पार्टी के संरक्षण के लिए बिरादरी और लोगों के बीच पैठ सहित कई फैक्टर अपना काम करेंगे।
कशमकश में पार्टियां : टिकट एक, चेहरे अनेक
सरकार के इस फैसले से पार्टियों के सामने दिक्कत खड़ी हो गई है। टिकट एक है और इसके चाहवान चेहरों की कमी नहीं। भाजपा के आशीर्वाद के लिए कई उम्मीदवार प्रयासरत हैं। इससे पार्टी के भीतर ही प्रतिस्पर्धा का माहौल बन गया है। निवर्तमान मेयर रेनू बाला गुप्ता के अलावा सुजाता अरोड़ा और निवर्तमान सीनियर डिप्टी मेयर कृष्ण गर्ग की पुत्रवधु कतार में हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता अशोक सुखिजा व अशोक भंडारी के परिवार से भी दावेदारी जताई जा रही हैं। वहीं, कुछ नए चेहरे भी दावा जता रहे हैं। देखने वाली बात यह है कि आखिर पार्टी किस पर भरोसा जताएगी। इनेलो की तरफ से पूर्व डिप्टी मेयर मनोज वधवा की पत्नी का नाम लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, पार्टी ने अभी इसकी आधिकारिक रूप से घोषणा नहीं की है।
कितनी कारगर रहेगी कांग्रेस की रणनीति
इस समय बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस का चेहरा कौन बनेगा? विधानसभा से ठीक पहले मेयर का चुनाव होेने की वजह से कांग्रेस कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है। पार्टी महिला उम्मीदवार के लिए किसे चुनेगी? क्या पार्टी का चेहरा प्रवेश गाबा, जोगिंद्र सिंह या कैलाश गुप्ता के परिवार से कोई होगा? चर्चा है कि इसके अलावा किसी नये उम्मीदवार पर भी भरोसा जताया जा सकता है। कांग्रेस की रणनीति कितनी कारगर रहेगी यह जनता तय करेगी।
आजाद दावेदारों की भी कमी नहीं, बलविंद्र सिंह और बाघ सिंह ने ठोकी ताल
टिकट नहीं मिला तो कुछ दिग्गज आजाद रूप से भी मैदान में उतरने का मन बना रहे हैं। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो दिग्गजों की किलेबंदी ढहाने का माद्दा रखते हैं। इस फेहरिस्त में वार्ड-2 के निवर्तमान पार्षद बलविंद्र सिंह सबसे आगे हैं। पांच साल में रिकॉर्ड विकास कार्यों की उपलब्धि। जनता से सीधा जुड़ाव उनकी ताकत मानी जाती है। वह जनता के बीच सक्रिय भी हो चुके हैं। इधर, वार्ड-1 के पूर्व पार्षद बाघ सिंह ने पहले ही आजाद चुनाव लड़ने का बिगुल फूंक दिया है। दोनो पार्षदों का दावा है कि वे मेयर पद के लिए अपनी पत्नियों को मैदान में उतारेंगे।
मेयर चुनाव बताएंगे वोटरों का रूझान
मेयर चुनाव की जीत तय करेगी कि वोटरों का रूझान क्या है। किस पार्टी में उनका विश्वास है। किसे जनता ने नकार दिया। काफी कुछ इसी से क्लीयर हो जाएगा। टिकट नहीं मिलने से खफा उम्मीदवार आगामी चुनाव में खुलकर विरोध में भी उतर सकते हैं। इसलिए सभी पार्टियां फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं, ताकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव पर इसका विपरीत असर न पड़े।