जिले के विभिन्न स्थानों पर पिछले 29 दिनों में गेहूं के अवशेष और अन्य कई स्थानों पर आग लगने के 170 मामले सामने आए हैं। इससे प्रदूषण का स्तर भी बढ़ रहा है। रविवार को कैथल में प्रदूषण का स्तर 245 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया।
जानकारी के अनुसार गेहूं की फसल के अवशेष में आग लगाने से प्रदेश के छह जिलों में हालात बेहद खराब बने हुए हैं। इसमें यमुनानगर, करनाल, सिरसा, रोहतक, पंचकूला व जींद शामिल है। रविवार को कैथल में प्रदूषण का स्तर 245 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया। शेष जिलों में भी प्रदूषण का स्तर 224 माइक्रोग्राम प्रतिघन मीटर से 296 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एसडीओ विकास कुमार ने कहा कि फसलों में आग लगाने फैक्ट्रियों व गली मोहल्लों में जलाए जा रहे कूड़े से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड सहित अन्य जहरीली गैसें निकलती है। जो कि लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालती है।
उप कृषि निदेशक कर्मचंद का कहना है कि खेतों में फाने जलाने से भूमि की उर्वरा शक्ति कमजोर हो जाती है। भूमि में मित्र कीट होते हैं, जो आग की वजह से जल जाते हैं। इसके अलावा ऑर्गेनिक कार्बन का नुकसान होता है। जिससे उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। आगजनी की वजह से जो वायु प्रदूषण होता है, उससे एलर्जी, दमा व सांस संबंधी बीमारियां भी होती है। जिन किसानों के यहां फसल अवशेष जलाए जाने की लोकेशन मिली है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।